श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 11
अध्याय 2 – सांख्ययोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
श्रीभगवानुवाच ।
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
śrībhagavānuvāca .
aśocyānanvaśocastvaṃ prajñāvādāṃśca bhāṣase .
gatāsūnagatāsūṃśca nānuśocanti paṇḍitāḥ ॥
अर्थ
श्रीभगवान ने कहा — तुम उनके लिए शोक कर रहे हो जो शोक करने योग्य नहीं हैं, और साथ ही विद्वानों जैसी बातें भी कह रहे हो। परन्तु ज्ञानी पुरुष न तो जिनके प्राण चले गए उनके लिए शोक करते हैं, न जिनके प्राण नहीं गए उनके लिए
शब्दार्थ
- अशोच्यान् – जो शोक करने योग्य नहीं, उनके लिए
- अन्वशोचः – शोक कर रहे हो
- त्वम् – तुम
- प्रज्ञावादान् – बुद्धिमानों जैसे वचन
- च – और
- भाषसे – बोल रहे हो
- गतासून् – जिनके प्राण चले गए (मृत)
- अगतासून् – जिनके प्राण नहीं गए (जीवित)
- च – और
- न अनुशोचन्ति – शोक नहीं करते
- पण्डिताः – ज्ञानी पुरुष, आत्मज्ञानी
अन्वय
श्रीभगवान् उवाच — त्वम् अशोच्यान् अन्वशोचः, प्रज्ञावादान् च भाषसे । पण्डिताः गतासून् अगतासून् च न अनुशोचन्ति ।
व्याख्या
यहीं से भगवद्गीता का वास्तविक उपदेश आरम्भ होता है, और पहला ही वाक्य अर्जुन की पूरी सोच की जड़ पर प्रहार करता है। श्रीकृष्ण कहते हैं — ‘अशोच्यानन्वशोचस्त्वम्’ — तुम उनके लिए शोक कर रहे हो जो शोक के योग्य ही नहीं हैं। यह चौंकाने वाला कथन है। भीष्म, द्रोण और स्वजन — क्या उनकी मृत्यु शोक का विषय नहीं? श्रीकृष्ण का उत्तर आगे के श्लोकों में खुलता है: जो वास्तव में ‘वे’ हैं — आत्मा — वह मरता ही नहीं; और जो मरता है — शरीर — वह तो स्वभाव से ही नश्वर है। अतः दोनों ही दृष्टियों से शोक का कोई आधार नहीं।
दूसरा वाक्य — ‘प्रज्ञावादांश्च भाषसे’ — एक तीखा किन्तु स्नेहपूर्ण व्यंग्य है। अर्जुन ने पहले अध्याय में कुलधर्म, पितरों की गति, समाज के पतन जैसी बड़ी-बड़ी शास्त्रीय बातें कही थीं। श्रीकृष्ण कहते हैं — तुम्हारी भाषा पण्डितों की है, परन्तु तुम्हारा शोक अज्ञानियों का है। ज्ञान की बातें करना और ज्ञान में स्थित होना — दोनों में बहुत अन्तर है।
‘गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः’ — सच्चे ज्ञानी न मृतकों के लिए शोक करते हैं, न जीवितों के लिए। यहाँ ‘पण्डित’ का अर्थ केवल शास्त्र पढ़ा हुआ व्यक्ति नहीं, बल्कि आचार्य शंकर के अनुसार वह है जिसकी बुद्धि (पण्डा) आत्मविषयक हो गई है — जो आत्मा को जानता है। ऐसा व्यक्ति जानता है कि मृत्यु केवल शरीर का परिवर्तन है, और जीवन में भी शरीर के प्रति अत्यधिक आसक्ति दुःख का कारण है।
आचार्य शंकर इस श्लोक को गीता-शास्त्र का प्रारम्भ मानते हैं और कहते हैं कि शोक और मोह — जो संसार के मूल कारण हैं — उनकी निवृत्ति के लिए ही भगवान आत्मज्ञान का उपदेश आरम्भ करते हैं। रामानुजाचार्य भी कहते हैं कि यहाँ से भगवान आत्मा के नित्य स्वरूप और शरीर के अनित्य स्वरूप का भेद बताकर अर्जुन के मोह को दूर करते हैं। माध्वाचार्य के अनुसार यहाँ भगवान यह स्थापित करते हैं कि जीव नित्य है और भगवान के अधीन है, अतः शोक का कारण नहीं।
ध्यान देने योग्य है कि श्रीकृष्ण संवेदना का निषेध नहीं कर रहे। वे उस शोक का निषेध कर रहे हैं जो अज्ञान से उत्पन्न होकर मनुष्य को कर्तव्य से विमुख कर देता है। करुणा तब सच्ची होती है जब वह सत्य की समझ पर आधारित हो।
यह श्लोक आज के मनुष्य के लिए भी अत्यन्त प्रासंगिक है। हम प्रायः उन चीज़ों के लिए दुःखी होते हैं जो या तो अपरिहार्य हैं या जिनका वास्तविक स्वरूप हम समझते ही नहीं। जब हम जीवन और मृत्यु के गहरे सत्य को समझ लेते हैं, तो शोक की जगह शान्त स्वीकृति और विवेकपूर्ण कर्म ले लेता है।
प्रसंग
2.10 में संजय ने बताया कि श्रीकृष्ण मुस्कुराते हुए बोले। यह श्लोक श्रीकृष्ण के उपदेश का पहला वाक्य है। इसके बाद 2.12 से 2.30 तक वे आत्मा की नित्यता और अमरता का विस्तृत वर्णन करते हैं, जो शोक-निवृत्ति का आधार है।
जीवन-शिक्षा
ज्ञान की बातें करना पर्याप्त नहीं; ज्ञान को जीना आवश्यक है। जो अपरिहार्य है या जो वास्तव में नष्ट होता ही नहीं, उसके लिए व्याकुल होने के बजाय सत्य को समझकर शान्त मन से अपना कर्तव्य निभाइए।
मुख्य शब्द
- अशोच्य
- जिसके लिए शोक करना उचित नहीं
- प्रज्ञावाद
- बुद्धिमानों जैसी बातें, शास्त्रीय तर्क
- पण्डित
- आत्मज्ञानी, जिसकी बुद्धि आत्मा में स्थित हो
- असु
- प्राण
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 2.6 – न चैतद्विद्मः कतरन्नो
- गीता 2.7 – कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
- गीता 2.8 – न हि प्रपश्यामि
- गीता 2.9 – सञ्जय उवाच
- गीता 2.10 – तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव
- गीता 2.12 – न त्वेवाहं जातु
- गीता 2.13 – देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं
- गीता 2.14 – मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः
- गीता 2.15 – यं हि न
- गीता 2.16 – नासतो विद्यते भावो