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श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 33

अध्याय 2 – सांख्ययोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि ।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

atha cettvamimaṃ dharmyaṃ saṃgrāmaṃ na kariṣyasi .
tataḥ svadharmaṃ kīrtiṃ ca hitvā pāpamavāpsyasi ॥

अर्थ

किन्तु यदि तुम इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करोगे, तो अपने स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगे

शब्दार्थ

  • अथ – किन्तु
  • चेत् – यदि
  • त्वम् – तुम
  • इमम् – इस
  • धर्म्यम् – धर्मयुक्त
  • संग्रामम् – युद्ध को
  • न करिष्यसि – नहीं करोगे
  • ततः – तब
  • स्वधर्मम् – अपने धर्म को
  • कीर्तिम् – यश को
  • च – और
  • हित्वा – खोकर, त्यागकर
  • पापम् – पाप को
  • अवाप्स्यसि – प्राप्त करोगे

अन्वय

अथ चेत् त्वम् इमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि, ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापम् अवाप्स्यसि ।

व्याख्या

पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण ने युद्ध करने का लाभ बताया था; अब वे युद्ध न करने की हानि बताते हैं। यह एक कुशल परामर्शदाता की पद्धति है — दोनों पक्षों को स्पष्ट करना। अर्जुन सोच रहा था कि युद्ध करने से पाप लगेगा (1.36); श्रीकृष्ण कहते हैं कि वास्तव में युद्ध न करने से पाप लगेगा।

यह एक बहुत महत्त्वपूर्ण नैतिक सिद्धान्त है: कर्तव्य से भागना भी एक प्रकार का कर्म है, और उसका भी फल होता है। जब किसी व्यक्ति पर निर्दोषों की रक्षा का दायित्व हो और वह भावुकता के कारण पीछे हट जाए, तो उसकी निष्क्रियता अन्याय को बढ़ावा देती है। अतः ‘कुछ न करना’ हर बार निर्दोष नहीं होता।

श्रीकृष्ण तीन हानियाँ गिनाते हैं: स्वधर्म का त्याग, कीर्ति का नाश और पाप की प्राप्ति। आचार्य शंकर स्पष्ट करते हैं कि जो अपने विहित कर्तव्य को छोड़ता है, वह शास्त्र के आदेश का उल्लंघन करता है, और यही पाप है। साथ ही उसका सम्मान भी नष्ट होता है, जो एक योद्धा के जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है।

जीवन में भी जब हम किसी आवश्यक कठिन कार्य से बचते हैं — किसी अन्याय के विरुद्ध न बोलना, किसी उत्तरदायित्व को टाल देना — तो वह भी हमारे चरित्र पर एक दाग़ छोड़ता है। सही समय पर सही कर्म करना ही धर्म है।

प्रसंग

2.32 में श्रीकृष्ण ने धर्मयुद्ध को स्वर्ग का द्वार कहा। यहाँ वे युद्ध न करने के परिणाम — धर्म, कीर्ति की हानि और पाप — बताते हैं। अगले श्लोक (2.34) में वे अपकीर्ति के दुष्परिणाम को विस्तार से बताते हैं।

जीवन-शिक्षा

कर्तव्य से भागना भी एक कर्म है जिसका परिणाम होता है। जब किसी उचित कार्य का दायित्व आप पर हो, तो उससे बचना निर्दोषता नहीं, बल्कि अपने धर्म से चूकना है।

मुख्य शब्द

धर्म्य संग्राम
धर्मयुक्त युद्ध
कीर्ति
यश, सम्मान
पाप
धर्म के उल्लंघन से उत्पन्न दोष

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