श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 63
अध्याय 2 – सांख्ययोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
krodhādbhavati sammohaḥ sammohātsmṛtivibhramaḥ .
smṛtibhraṃśād buddhināśo buddhināśātpraṇaśyati ॥
अर्थ
क्रोध से सम्मोह (गहरी मूढ़ता) उत्पन्न होता है, सम्मोह से स्मृति भ्रमित हो जाती है, स्मृति के नष्ट होने से बुद्धि का नाश होता है, और बुद्धि के नाश से मनुष्य स्वयं नष्ट हो जाता है
शब्दार्थ
- क्रोधात् – क्रोध से
- भवति – होता है
- सम्मोहः – गहरा मोह, विवेकहीन मूढ़ता
- सम्मोहात् – मोह से
- स्मृतिविभ्रमः – स्मृति का भ्रम, सही बात का भूल जाना
- स्मृतिभ्रंशात् – स्मृति के नष्ट होने से
- बुद्धिनाशः – बुद्धि (विवेक) का नाश
- बुद्धिनाशात् – बुद्धि के नाश से
- प्रणश्यति – पूरी तरह नष्ट हो जाता है
अन्वय
क्रोधात् सम्मोहः भवति, सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः, स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशः, बुद्धिनाशात् (पुरुषः) प्रणश्यति ।
व्याख्या
पिछले श्लोक में पतन की सीढ़ी के चार पायदान बताए गए थे — विषय-चिन्तन, आसक्ति, कामना और क्रोध। यह श्लोक उसी सीढ़ी को अन्त तक ले जाता है। क्रोध के बाद चार और पायदान हैं — सम्मोह, स्मृति-भ्रंश, बुद्धि-नाश और पूर्ण विनाश। इस प्रकार दोनों श्लोकों में कुल आठ कड़ियों की एक ऐसी शृंखला है जो एक साधारण विचार से आरम्भ होकर मनुष्य के सर्वनाश तक पहुँचती है।
पाँचवाँ पायदान — ‘क्रोधाद्भवति सम्मोहः’ — क्रोध से सम्मोह। क्रोध आते ही मनुष्य की विवेक-शक्ति धुँधली हो जाती है। उसे यह भान नहीं रहता कि क्या उचित है और क्या अनुचित, कौन अपना है और कौन पराया। आचार्य शंकर उदाहरण देते हैं कि क्रोधित व्यक्ति अपने गुरु तक का अपमान कर बैठता है। यह ‘सम्+मोह’ — पूर्ण मोह — है, जैसे आँखों पर धुएँ का पर्दा पड़ गया हो।
छठा पायदान — ‘सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः’ — मोह से स्मृति का भ्रम। यहाँ ‘स्मृति’ का अर्थ केवल याददाश्त नहीं है। यह उन सब बातों की स्मृति है जो हमने शास्त्रों, गुरुओं और अपने अनुभव से सीखी हैं — अपने मूल्य, अपने वचन, अपने सम्बन्धों की मर्यादा, कर्मों के परिणाम। मोह की अवस्था में ये सब भूल जाते हैं। व्यक्ति वह कह बैठता है जो कभी नहीं कहना चाहता था, वह कर बैठता है जिसका परिणाम वह भली-भाँति जानता था।
सातवाँ पायदान — ‘स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशः’ — स्मृति के नष्ट होने से बुद्धि का नाश। बुद्धि वह शक्ति है जो सही-ग़लत का निर्णय करती है। पर निर्णय करने के लिए उसे स्मृति का आधार चाहिए — सिद्धान्तों और अनुभवों का। जब स्मृति ही नहीं रही, तो बुद्धि किस आधार पर निर्णय करे? आचार्य शंकर बुद्धिनाश को अन्तःकरण की कार्य करने की अयोग्यता बताते हैं — बुद्धि रहते हुए भी वह काम नहीं करती।
आठवाँ और अन्तिम पायदान — ‘बुद्धिनाशात्प्रणश्यति’ — बुद्धि के नाश से मनुष्य का विनाश। आचार्य शंकर के शब्दों में, मनुष्य तभी तक मनुष्य है जब तक उसका अन्तःकरण कर्तव्य-अकर्तव्य का विवेक करने में समर्थ है; विवेक खोते ही वह पुरुषार्थ के अयोग्य हो जाता है — यही उसका विनाश है। यह विनाश शारीरिक मृत्यु से भी गम्भीर है, क्योंकि यह जीवन के परम लक्ष्य से पतन है। रामानुजाचार्य भी कहते हैं कि बुद्धि के नष्ट होने पर व्यक्ति पुनः संसार-चक्र में डूब जाता है।
इस शृंखला को समझने के लिए एक उदाहरण लें। किसी व्यक्ति ने मित्र की नई गाड़ी देखी (चिन्तन), बार-बार उसके बारे में सोचने लगा (आसक्ति), उसे भी वैसी ही चाहिए (कामना), पैसे नहीं हैं तो परिवार पर झुँझलाने लगा (क्रोध), क्रोध में अपना-पराया भूल गया (मोह), अपने संस्कार और ईमानदारी का मूल्य भूल गया (स्मृति-भ्रंश), कोई ग़लत रास्ता अपना लिया (बुद्धि-नाश), और अन्ततः अपनी प्रतिष्ठा और शान्ति दोनों खो बैठा (विनाश)।
यह श्लोक हमें डराने के लिए नहीं, जगाने के लिए है। हर कड़ी पर रुकने का अवसर है, पर जितना नीचे जाते हैं, रुकना उतना कठिन होता जाता है। इसलिए सबसे बुद्धिमानी पहली कड़ी पर ही सजग होने में है। और यह शृंखला उलटी दिशा में भी काम करती है — ईश्वर या सद्विचार का चिन्तन सत्संग, सद्भाव, शान्ति और अन्ततः मुक्ति तक ले जाता है, जिसका वर्णन अगले श्लोकों में है।
प्रसंग
2.62 में पतन की सीढ़ी के पहले चार पायदान — विषय-चिन्तन, आसक्ति, कामना और क्रोध — बताए गए। यह श्लोक शेष चार — सम्मोह, स्मृति-भ्रंश, बुद्धि-नाश और विनाश — का वर्णन करता है। अगले श्लोक (2.64) में श्रीकृष्ण इसके विपरीत, उत्थान का मार्ग बताते हैं — राग-द्वेष से मुक्त इन्द्रियों से विचरने वाला प्रसाद (शान्ति) पाता है।
जीवन-शिक्षा
क्रोध में कोई निर्णय मत लीजिए, कोई वचन मत बोलिए — उस समय स्मृति और विवेक दोनों धुँधले होते हैं। पतन की हर कड़ी पर रुकने का अवसर है; जितना जल्दी रुकें, उतना सरल है।
मुख्य शब्द
- सम्मोह
- क्रोध से उत्पन्न पूर्ण मूढ़ता, उचित-अनुचित का भान न रहना
- स्मृति-भ्रंश
- सीखे हुए मूल्यों, सिद्धान्तों और अनुभवों का भूल जाना
- बुद्धि-नाश
- विवेक-शक्ति का कार्य न कर पाना
- प्रणाश
- जीवन के परम लक्ष्य से पूर्ण पतन
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 2.58 – यदा संहरते चायं
- गीता 2.59 – विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य
- गीता 2.60 – यततो ह्यपि कौन्तेय
- गीता 2.61 – तानि सर्वाणि संयम्य
- गीता 2.62 – ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते
- गीता 2.64 – रागद्वेषविमुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्
- गीता 2.65 – प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते
- गीता 2.66 – नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न
- गीता 2.67 – इन्द्रियाणां हि चरतां
- गीता 2.68 – तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि