भगवद् गीता वर्ल्ड

श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 32

अध्याय 2 – सांख्ययोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् ।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

yadṛcchayā copapannaṃ svargadvāramapāvṛtam .
sukhinaḥ kṣatriyāḥ pārtha labhante yuddhamīdṛśam ॥

अर्थ

हे पार्थ! अपने आप प्राप्त हुआ और स्वर्ग के खुले द्वार के समान ऐसा युद्ध भाग्यशाली क्षत्रियों को ही प्राप्त होता है

शब्दार्थ

  • यदृच्छया – अपने आप, बिना माँगे
  • च – और
  • उपपन्नम् – प्राप्त हुआ
  • स्वर्गद्वारम् – स्वर्ग का द्वार
  • अपावृतम् – खुला हुआ
  • सुखिनः – सौभाग्यशाली, सुखी
  • क्षत्रियाः – क्षत्रिय
  • पार्थ – हे पार्थ
  • लभन्ते – प्राप्त करते हैं
  • युद्धम् – युद्ध
  • ईदृशम् – ऐसा

अन्वय

पार्थ, यदृच्छया च उपपन्नम् अपावृतं स्वर्गद्वारम् ईदृशं युद्धं सुखिनः क्षत्रियाः लभन्ते ।

व्याख्या

स्वधर्म की बात को आगे बढ़ाते हुए श्रीकृष्ण इस युद्ध को एक दुर्लभ अवसर के रूप में प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं — यह युद्ध तुमने स्वयं नहीं माँगा; यह ‘यदृच्छया’ — अपने आप, परिस्थितियों के कारण — तुम्हारे सामने आया है। और यह स्वर्ग का खुला द्वार है।

प्राचीन क्षत्रिय-धर्म के अनुसार जो योद्धा धर्मयुद्ध में वीरता से लड़ता है, उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है। श्रीकृष्ण यहाँ अर्जुन की उसी परम्परागत मान्यता से बात करते हैं, जिसे अर्जुन स्वयं जानता और मानता है। अर्जुन ने पहले अध्याय में डर व्यक्त किया था कि युद्ध से नरक मिलेगा; श्रीकृष्ण उलटा बताते हैं कि धर्मयुद्ध से स्वर्ग का द्वार खुलता है।

‘सुखिनः क्षत्रियाः’ — भाग्यशाली क्षत्रिय — यह कहकर श्रीकृष्ण बताते हैं कि ऐसा अवसर हर किसी को नहीं मिलता। एक योद्धा का जीवन ऐसे ही धर्मसंकट में अपने धर्म को सिद्ध करने के लिए होता है।

यह ध्यान रखना चाहिए कि यहाँ स्वर्ग का उल्लेख गीता का अन्तिम लक्ष्य नहीं है। श्रीकृष्ण आगे (2.42–2.46) स्वर्ग जैसे फलों की कामना से भी ऊपर उठने की शिक्षा देंगे। यहाँ वे अर्जुन के स्तर पर उतरकर, उसकी अपनी मान्यताओं के आधार पर उसे समझा रहे हैं। जीवन में भी, जब कोई कठिन उत्तरदायित्व अपने आप हमारे सामने आए, तो उसे बोझ नहीं, अपनी क्षमता को सिद्ध करने का अवसर मानना चाहिए।

प्रसंग

2.31 में श्रीकृष्ण ने कहा कि क्षत्रिय के लिए धर्मयुद्ध से बढ़कर कुछ नहीं। यहाँ वे इस युद्ध को स्वर्ग का खुला द्वार बताते हैं। अगले श्लोक (2.33) में वे बताते हैं कि युद्ध न करने पर अर्जुन को क्या हानि होगी।

जीवन-शिक्षा

जो कठिन उत्तरदायित्व बिना माँगे जीवन में आ जाए, उसे भाग्य का अवसर समझिए। ऐसे क्षण ही व्यक्ति के चरित्र और क्षमता को निखारते हैं।

मुख्य शब्द

यदृच्छा
अपने आप, बिना प्रयास के प्राप्त होना
स्वर्गद्वार
स्वर्ग का द्वार
अपावृत
खुला हुआ

इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक

श्रीकृष्ण से जुड़ी सामग्री

लोकप्रिय गीता श्लोक