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श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 30

अध्याय 2 – सांख्ययोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

dehī nityamavadhyo.ayaṃ dehe sarvasya bhārata .
tasmātsarvāṇi bhūtāni na tvaṃ śocitumarhasi ॥

अर्थ

हे भारत! सबके शरीर में रहने वाला यह देही (आत्मा) सदा ही अवध्य है — इसे कभी मारा नहीं जा सकता। इसलिए तुम्हें किसी भी प्राणी के लिए शोक नहीं करना चाहिए

शब्दार्थ

  • देही – देह में रहने वाला आत्मा
  • नित्यम् – सदा
  • अवध्यः – जिसका वध न हो सके
  • अयम् – यह
  • देहे – शरीर में
  • सर्वस्य – सबके
  • भारत – हे भारत
  • तस्मात् – इसलिए
  • सर्वाणि – सभी
  • भूतानि – प्राणियों के (लिए)
  • न – नहीं
  • त्वम् – तुम
  • शोचितुम् – शोक करने के
  • अर्हसि – योग्य हो

अन्वय

भारत, सर्वस्य देहे अयं देही नित्यम् अवध्यः (अस्ति) । तस्मात् त्वं सर्वाणि भूतानि (उद्दिश्य) शोचितुं न अर्हसि ।

व्याख्या

यह श्लोक 2.11 से आरम्भ हुए आत्म-विषयक उपदेश (सांख्य-ज्ञान) का उपसंहार है। श्रीकृष्ण पूरे विवेचन का सार एक वाक्य में कह देते हैं: हर प्राणी के शरीर में जो देही रहता है, वह सदा अवध्य है। अतः किसी भी प्राणी के लिए शोक करना उचित नहीं।

‘सर्वस्य देहे’ — सबके शरीर में — यह शब्द इस ज्ञान की सार्वभौमिकता को दिखाता है। केवल भीष्म और द्रोण ही नहीं, बल्कि हर जीव — मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट — सबमें वही अविनाशी आत्मा है। इसलिए आत्म-दृष्टि से कोई भी प्राणी शोक का विषय नहीं।

‘नित्यमवध्यः’ — सदा अवध्य — यह इस उपदेश का केन्द्रीय शब्द है। अर्जुन का सारा दुःख ‘वध’ के विचार से उत्पन्न हुआ था। श्रीकृष्ण अन्त में यही कहते हैं कि वास्तविक ‘मैं’ और ‘तुम’ का कभी वध होता ही नहीं।

इस खण्ड (2.11–2.30) में श्रीकृष्ण ने अनेक दृष्टियों से आत्मा का स्वरूप समझाया — उसकी नित्यता (2.12), शरीर-परिवर्तन (2.13, 2.22), सत्-असत् का भेद (2.16), उसकी अविनाशिता (2.17–2.25), जन्म-मृत्यु की अनिवार्यता (2.26–2.27) और उसका आश्चर्यमय स्वरूप (2.29)। आचार्य शंकर इसे ‘सांख्य-बुद्धि’ कहते हैं — अर्थात् परम सत्य का विवेकपूर्ण ज्ञान। अब श्रीकृष्ण एक दूसरी, व्यावहारिक दृष्टि — स्वधर्म — से अर्जुन को समझाएँगे।

इस उपदेश का जीवन में सन्देश यह है कि जब हम सभी प्राणियों में एक ही अविनाशी चेतना को देखते हैं, तो मृत्यु का भय मिटता है, शोक कम होता है, और सभी के प्रति एक गहरा सम्मान और आत्मीयता उत्पन्न होती है।

प्रसंग

2.29 में श्रीकृष्ण ने आत्मज्ञान की दुर्लभता बताई। यह श्लोक 2.11–2.30 के आत्म-विषयक उपदेश का सार और उपसंहार है। अगले श्लोक (2.31) से वे स्वधर्म की दृष्टि से अर्जुन को युद्ध के लिए प्रेरित करते हैं।

जीवन-शिक्षा

हर प्राणी में वही अविनाशी आत्मा है। इस सत्य को समझकर शोक और भय से ऊपर उठिए, और सभी के प्रति सम्मान तथा आत्मीयता का भाव रखिए।

मुख्य शब्द

अवध्य
जिसका वध न हो सके
देही
देह में रहने वाला आत्मा
सांख्य-बुद्धि
आत्मा और अनात्मा के विवेक पर आधारित ज्ञान

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