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श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 28

अध्याय 2 – सांख्ययोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

avyaktādīni bhūtāni vyaktamadhyāni bhārata .
avyaktanidhanānyeva tatra kā paridevanā ॥

अर्थ

हे भारत! सभी प्राणी जन्म से पहले अव्यक्त (अप्रकट) थे, बीच में व्यक्त (प्रकट) हैं और मृत्यु के बाद फिर अव्यक्त हो जाते हैं। फिर इसमें शोक की क्या बात है?

शब्दार्थ

  • अव्यक्तादीनि – आदि में अव्यक्त (जन्म से पहले अप्रकट)
  • भूतानि – प्राणी
  • व्यक्तमध्यानि – मध्य में व्यक्त (प्रकट)
  • भारत – हे भरतवंशी
  • अव्यक्तनिधनानि – अन्त में अव्यक्त
  • एव – ही
  • तत्र – उसमें
  • का – क्या
  • परिदेवना – विलाप, शोक

अन्वय

भारत, भूतानि अव्यक्तादीनि व्यक्तमध्यानि अव्यक्तनिधनानि एव (सन्ति); तत्र परिदेवना का ?

व्याख्या

यह श्लोक जीवन को एक व्यापक दृष्टि से देखने का निमन्त्रण है। श्रीकृष्ण कहते हैं — हर प्राणी की कहानी तीन भागों में है: आरम्भ में वह अव्यक्त था, अर्थात् हमारी इन्द्रियों के लिए उसका कोई अस्तित्व नहीं था; मध्य में वह व्यक्त होता है — दिखता है, बोलता है, सम्बन्ध बनाता है; और अन्त में वह फिर अव्यक्त हो जाता है।

हम जन्म से पहले के ‘अदृश्य’ होने पर शोक नहीं करते। फिर मृत्यु के बाद के ‘अदृश्य’ होने पर इतना विलाप क्यों? जैसे स्वप्न में दृश्य प्रकट होते हैं और जागने पर लुप्त हो जाते हैं, या जैसे बादल आकाश से उत्पन्न होकर उसी में विलीन हो जाते हैं, वैसे ही प्राणी अव्यक्त से आते हैं और अव्यक्त में लौट जाते हैं। व्यक्त अवस्था तो केवल एक छोटा-सा मध्य अन्तराल है।

आचार्य शंकर यह बताते हैं कि जो वस्तु आदि और अन्त में नहीं है, उसका मध्य का अस्तित्व भी स्थायी नहीं, बल्कि आभास जैसा है — जैसे जादू का खेल। रामानुजाचार्य इसे इस प्रकार समझाते हैं कि शरीर सूक्ष्म अवस्था से स्थूल अवस्था में आते हैं और फिर सूक्ष्म में लौट जाते हैं; यह प्रकृति का स्वाभाविक क्रम है, जिसमें शोक का स्थान नहीं।

‘तत्र का परिदेवना’ — इसमें शोक कैसा? यह प्रश्न अर्जुन को और हमें, दोनों को सोचने पर विवश करता है। जीवन एक प्रवाह है; उसके किसी एक दृश्य से अत्यधिक चिपक जाना ही दुःख का कारण है।

प्रसंग

2.27 में श्रीकृष्ण ने बताया कि जन्म और मृत्यु अनिवार्य हैं। यहाँ वे प्राणियों के अव्यक्त-व्यक्त-अव्यक्त क्रम को दिखाकर शोक को निरर्थक बताते हैं। अगले श्लोक (2.29) में वे बताते हैं कि आत्मा का ज्ञान कितना आश्चर्यजनक और दुर्लभ है।

जीवन-शिक्षा

जीवन एक प्रवाह है जो अदृश्य से आकर अदृश्य में लौट जाता है। प्रियजनों और अवसरों के साथ बिताए व्यक्त क्षणों को कृतज्ञता से जीइए, परन्तु उनके परिवर्तन पर अत्यधिक विलाप मत कीजिए।

मुख्य शब्द

अव्यक्त
अप्रकट, इन्द्रियों के लिए अदृश्य अवस्था
व्यक्त
प्रकट, दृश्य अवस्था
परिदेवना
विलाप, रोना-धोना

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