श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 4, श्लोक 8
अध्याय 4 – ज्ञानकर्मसंन्यासयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
paritrāṇāya sādhūnāṃ vināśāya ca duṣkṛtām .
dharmasaṃsthāpanārthāya sambhavāmi yuge yuge ॥
अर्थ
सज्जनों की रक्षा करने के लिए, दुष्कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म को भली-भाँति स्थापित करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ
शब्दार्थ
- परित्राणाय – पूर्ण रूप से रक्षा करने के लिए
- साधूनाम् – साधुओं, सज्जनों की
- विनाशाय – विनाश के लिए
- च – और
- दुष्कृताम् – दुष्कर्म करने वालों का
- धर्मसंस्थापनार्थाय – धर्म की भली-भाँति स्थापना के लिए
- सम्भवामि – प्रकट होता हूँ
- युगे युगे – प्रत्येक युग में, युग-युग में
अन्वय
साधूनां परित्राणाय, दुष्कृतां विनाशाय च, धर्मसंस्थापनार्थाय (अहं) युगे युगे सम्भवामि ।
व्याख्या
पिछले श्लोक में भगवान ने बताया कि वे कब प्रकट होते हैं; इस श्लोक में वे बताते हैं कि क्यों प्रकट होते हैं। अवतार के तीन उद्देश्य हैं — साधुओं का परित्राण, दुष्टों का विनाश और धर्म की संस्थापना। ये दोनों श्लोक मिलकर अवतार-सिद्धान्त का पूर्ण स्वरूप प्रस्तुत करते हैं।
‘परित्राणाय साधूनाम्’ — साधु कौन है? केवल गेरुआ वस्त्र पहनने वाला नहीं, बल्कि वह जो सत्य, धर्म और भगवान के मार्ग पर चलता है। ‘परित्राण’ शब्द में ‘परि’ उपसर्ग बताता है कि यह रक्षा सम्पूर्ण है — केवल शरीर की नहीं, उनकी श्रद्धा, उनके मार्ग और उनके हृदय की भी। आचार्य रामानुज यहाँ एक मार्मिक बात कहते हैं — भगवान के सच्चे भक्त उनके दर्शन के बिना व्याकुल रहते हैं; उन्हें अपना रूप दिखाकर, उनसे संवाद करके उनके हृदय को तृप्त करना भी अवतार का प्रमुख उद्देश्य है। इस दृष्टि से अवतार प्रेम का ही प्रकाश है।
‘विनाशाय च दुष्कृताम्’ — दुष्कर्म करने वालों का विनाश। यहाँ प्रश्न उठता है कि सर्वशक्तिमान भगवान को दुष्टों को मारने के लिए जन्म लेने की क्या आवश्यकता है? वे तो संकल्प मात्र से ऐसा कर सकते हैं। आचार्यों का उत्तर है कि दुष्टों का विनाश प्रासंगिक उद्देश्य है; मुख्य उद्देश्य भक्तों का कल्याण और धर्म की स्थापना है। परम्परा यह भी मानती है कि भगवान के हाथों मृत्यु भी उन दुष्टों के लिए शुद्धि का साधन बन जाती है — उनका विनाश दण्ड के साथ-साथ अनुग्रह भी है।
‘धर्मसंस्थापनार्थाय’ — धर्म की सम्यक् स्थापना के लिए। ‘सम्’ उपसर्ग बताता है कि यह स्थापना दृढ़ और भली-भाँति की जाती है। अवतार केवल संकट टालने नहीं आते, बल्कि आगे के लिए एक जीवन्त आदर्श और शिक्षा छोड़ जाते हैं — जैसे श्रीराम ने मर्यादा का आदर्श और श्रीकृष्ण ने गीता का ज्ञान दिया। आचार्य शंकर के अनुसार गीता का उपदेश स्वयं इसी धर्म-संस्थापना का अंग है।
‘सम्भवामि युगे युगे’ — युग-युग में प्रकट होता हूँ। यह वचन मानवता के लिए एक शाश्वत आश्वासन है। जिस प्रकार रात के बाद दिन आता है, उसी प्रकार अधर्म के अन्धकार के बाद धर्म का प्रकाश अवश्य लौटता है। भक्त के लिए यह श्लोक साहस देता है कि वह कभी अकेला नहीं है, और साधक के लिए यह प्रेरणा है कि वह भी अपने जीवन में धर्म की रक्षा का साधन बने।
प्रसंग
4.7 में भगवान ने बताया कि धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होने पर वे प्रकट होते हैं। यहाँ वे अवतार के तीन उद्देश्य बताते हैं। अगले श्लोक (4.9) में वे बताते हैं कि उनके दिव्य जन्म और कर्म को तत्त्व से जानने का फल क्या है।
जीवन-शिक्षा
ईश्वर सज्जनों की रक्षा करते हैं, इसलिए अच्छाई के मार्ग पर डटे रहिए, चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी विपरीत हों। साथ ही, हम भी अपने स्तर पर अच्छे लोगों का साथ देकर, अन्याय का विरोध करके और सद्गुणों को जीवित रखकर उस ईश्वरीय कार्य में सहभागी बन सकते हैं।
मुख्य शब्द
- साधु
- सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने वाला सज्जन
- दुष्कृत्
- दुष्कर्म करने वाला, दुराचारी
- धर्मसंस्थापन
- धर्म की दृढ़ और सम्यक् स्थापना
- युग
- काल का बड़ा चक्र — सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 4.3 – स एवायं मया
- गीता 4.4 – अर्जुन उवाच
- गीता 4.5 – श्रीभगवानुवाच
- गीता 4.6 – अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि
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- गीता 4.9 – जन्म कर्म च
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- गीता 4.11 – ये यथा मां
- गीता 4.12 – काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं
- गीता 4.13 – चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं