श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 59
अध्याय 2 – सांख्ययोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
viṣayā vinivartante nirāhārasya dehinaḥ .
rasavarjaṃ raso.apyasya paraṃ dṛṣṭvā nivartate ॥
अर्थ
विषयों को ग्रहण न करने वाले (निराहारी) देहधारी मनुष्य से विषय तो दूर हो जाते हैं, परन्तु उनका रस (भीतरी लालसा) नहीं जाता। परम तत्त्व का साक्षात्कार होने पर इसका वह रस भी निवृत्त हो जाता है
शब्दार्थ
- विषयाः – इन्द्रियों के विषय
- विनिवर्तन्ते – दूर हो जाते हैं, हट जाते हैं
- निराहारस्य – विषयों का आहार (ग्रहण) न करने वाले का
- देहिनः – देहधारी जीव का
- रसवर्जम् – रस (लालसा) को छोड़कर
- रसः – रस, स्वाद, सूक्ष्म आसक्ति
- अपि – भी
- अस्य – इसका (स्थितप्रज्ञ का)
- परम् – परम तत्त्व को
- दृष्ट्वा – देखकर, साक्षात् अनुभव करके
- निवर्तते – निवृत्त हो जाता है
अन्वय
निराहारस्य देहिनः विषयाः रसवर्जं विनिवर्तन्ते; अस्य रसः अपि परं दृष्ट्वा निवर्तते ।
व्याख्या
पिछले श्लोक में इन्द्रियों को विषयों से समेटने की बात कही गई थी। परन्तु एक प्रश्न उठता है — क्या केवल इन्द्रियों को रोक लेना पर्याप्त है? श्रीकृष्ण इस श्लोक में एक अत्यन्त गहरा मनोवैज्ञानिक सत्य बताते हैं: बाहरी संयम से विषय तो दूर हो जाते हैं, पर उनकी भीतरी लालसा बनी रहती है।
‘निराहार’ शब्द का अर्थ केवल उपवास करने वाला नहीं है। आचार्य शंकर कहते हैं कि यहाँ ‘आहार’ का अर्थ है इन्द्रियों द्वारा विषयों का ग्रहण। आँख का आहार रूप है, कान का शब्द, जीभ का स्वाद। जो व्यक्ति किसी कारण से — व्रत, रोग, भय या साधना से — विषयों का सेवन बन्द कर देता है, उससे विषय बाहर से तो हट जाते हैं। रोगी जो मिठाई नहीं खा सकता, वह मिठाई से दूर तो हो जाता है, पर उसकी जीभ मिठाई की याद में ललचाती रहती है। यही ‘रसवर्जम्’ — रस को छोड़कर — का अर्थ है।
यह ‘रस’ ही वास्तविक बन्धन है — मन के भीतर छिपी सूक्ष्म रुचि, स्वाद की स्मृति, लालसा का बीज। जब तक यह बीज बना है, अवसर मिलते ही वह फिर अंकुरित हो सकता है। इसीलिए बहुत से लोग वर्षों के संयम के बाद भी अचानक फिसल जाते हैं। बाहरी त्याग कच्चा होता है जब तक भीतर रस बचा हो।
तो यह रस कैसे मिटे? श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं — ‘परं दृष्ट्वा निवर्तते’ — परम तत्त्व के दर्शन से। जब व्यक्ति को उच्चतर आनन्द का अनुभव हो जाता है, तो निम्न आनन्द का आकर्षण अपने आप समाप्त हो जाता है। जिस बालक के हाथ में हीरा आ जाए, वह काँच के टुकड़ों के लिए नहीं रोता। आचार्य शंकर के अनुसार ‘पर’ है परमार्थ तत्त्व ब्रह्म, जिसके ‘मैं वही हूँ’ रूप में ज्ञान से सूक्ष्म वासना भी नष्ट हो जाती है। रामानुजाचार्य कहते हैं कि आत्मा के स्वरूप का अनुभव, जो विषय-सुख से कहीं श्रेष्ठ है, उस रस को मिटा देता है।
यह श्लोक साधना का सन्तुलित मार्ग दिखाता है। बाहरी संयम आवश्यक है — वह पहला कदम है, जैसा 2.58 में कहा गया। पर वह अन्तिम लक्ष्य नहीं। साथ-साथ उच्चतर आनन्द — ध्यान, भक्ति, ज्ञान — को भी विकसित करना होगा। केवल ‘ना’ कहना कठिन और अस्थायी है; किसी बड़े ‘हाँ’ को पा लेना ही स्थायी मुक्ति देता है।
प्रसंग
2.58 में कछुए के उदाहरण से इन्द्रियों को विषयों से समेटने की बात कही गई। यह श्लोक बताता है कि बाहरी संयम से भीतरी रस नहीं मिटता, वह परम के अनुभव से मिटता है। अगले श्लोक (2.60) में श्रीकृष्ण चेतावनी देते हैं कि इन्द्रियाँ इतनी प्रबल हैं कि प्रयत्नशील विद्वान के मन को भी बलपूर्वक हर लेती हैं।
जीवन-शिक्षा
किसी आदत को केवल दबाने से वह मिटती नहीं; उसकी जगह कोई ऊँचा और गहरा आनन्द खोजिए। जब जीवन में बड़ा अर्थ मिल जाता है, तो छोटी लालसाएँ स्वयं छूट जाती हैं।
मुख्य शब्द
- निराहार
- इन्द्रियों द्वारा विषयों का ग्रहण न करने वाला
- रस
- विषयों के प्रति सूक्ष्म रुचि, भीतर बची लालसा
- परम्
- परम तत्त्व, परमात्मा या आत्मा का सर्वोच्च स्वरूप
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 2.54 – अर्जुन उवाच
- गीता 2.55 – श्रीभगवानुवाच
- गीता 2.56 – दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः
- गीता 2.57 – यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्
- गीता 2.58 – यदा संहरते चायं
- गीता 2.60 – यततो ह्यपि कौन्तेय
- गीता 2.61 – तानि सर्वाणि संयम्य
- गीता 2.62 – ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते
- गीता 2.63 – क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः
- गीता 2.64 – रागद्वेषविमुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्