श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 43
अध्याय 2 – सांख्ययोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
kāmātmānaḥ svargaparā janmakarmaphalapradām .
kriyāviśeṣabahulāṃ bhogaiśvaryagatiṃ prati ॥
अर्थ
वे कामनाओं से भरे मन वाले और स्वर्ग को ही परम लक्ष्य मानने वाले लोग ऐसी वाणी बोलते हैं जो भोग और ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए अनेक प्रकार की क्रियाओं का वर्णन करती है और जो जन्म रूपी कर्मफल देने वाली है
शब्दार्थ
- कामात्मानः – कामनाओं से भरे मन वाले
- स्वर्गपराः – स्वर्ग को ही सर्वोच्च मानने वाले
- जन्मकर्मफलप्रदाम् – जन्म रूपी कर्मफल देने वाली
- क्रियाविशेषबहुलाम् – अनेक विशेष क्रियाओं (अनुष्ठानों) से भरी
- भोगैश्वर्यगतिम् – भोग और ऐश्वर्य की प्राप्ति
- प्रति – की ओर, के लिए
अन्वय
(ते) कामात्मानः स्वर्गपराः (च सन्तः) जन्मकर्मफलप्रदां भोगैश्वर्यगतिं प्रति क्रियाविशेषबहुलां (वाचं प्रवदन्ति) ।
व्याख्या
पिछले श्लोक का वर्णन आगे बढ़ाते हुए श्रीकृष्ण इन लोगों के मन का चित्र खींचते हैं। वे ‘कामात्मानः’ हैं — जिनका पूरा अस्तित्व ही कामनाओं से बना है। और वे ‘स्वर्गपराः’ हैं — जिनके लिए स्वर्ग ही सर्वोच्च लक्ष्य है।
उनकी वाणी ‘क्रियाविशेषबहुला’ है — अनेक प्रकार के अनुष्ठानों, विधियों और कर्मकाण्डों से भरी हुई। हर इच्छा के लिए एक अलग अनुष्ठान: धन के लिए एक, पुत्र के लिए दूसरा, स्वर्ग के लिए तीसरा। उनका पूरा धार्मिक जीवन ‘भोगैश्वर्यगति’ — भोग और ऐश्वर्य की प्राप्ति — की ओर केन्द्रित रहता है।
सबसे महत्त्वपूर्ण शब्द है ‘जन्मकर्मफलप्रदाम्’ — जो जन्म रूपी कर्मफल देती है। यही इस मार्ग की सीमा है। कामनापूर्वक किए गए कर्म अपना फल अवश्य देते हैं, परन्तु वह फल एक नए जन्म के रूप में ही भोगा जाता है। स्वर्ग भी स्थायी नहीं; पुण्य समाप्त होने पर फिर इस लोक में लौटना पड़ता है (जैसा 9.21 में कहा गया है)। इस प्रकार यह चक्र चलता रहता है, मुक्ति नहीं मिलती।
आचार्य रामानुज कहते हैं कि ऐसे लोग वेदों के अल्प फल वाले भाग में आसक्त होकर उस परम पुरुषार्थ — आत्मा और परमात्मा की प्राप्ति — को भूल जाते हैं। यह श्लोक हमें अपनी प्रार्थनाओं और धार्मिक कर्मों के उद्देश्य पर विचार करने को प्रेरित करता है।
प्रसंग
2.42 में श्रीकृष्ण ने वेदवादरत लोगों की फूलों जैसी वाणी का उल्लेख किया। यहाँ वे उनकी कामनाओं और उनके कर्मों के फल का वर्णन करते हैं। अगले श्लोक (2.44) में वे बताते हैं कि ऐसे लोगों की बुद्धि समाधि में स्थिर नहीं हो पाती।
जीवन-शिक्षा
अपने धार्मिक कर्मों और प्रार्थनाओं के उद्देश्य को परखिए। यदि वे केवल भोग और ऐश्वर्य के लिए हैं, तो वे हमें चक्र में ही बाँधे रखेंगे; आत्म-विकास के लिए किए गए कर्म ही मुक्त करते हैं।
मुख्य शब्द
- कामात्मा
- जिसका मन कामनाओं से भरा हो
- स्वर्गपर
- स्वर्ग को ही परम लक्ष्य मानने वाला
- भोगैश्वर्य
- भोग और ऐश्वर्य, सुख-सम्पत्ति और प्रभुत्व
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 2.38 – सुखदुःखे समे कृत्वा
- गीता 2.39 – एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये
- गीता 2.40 – नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न
- गीता 2.41 – व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन
- गीता 2.42 – यामिमां पुष्पितां वाचं
- गीता 2.44 – भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्
- गीता 2.45 – त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो
- गीता 2.46 – यावानर्थ उदपाने सर्वतः
- गीता 2.47 – कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु
- गीता 2.48 – योगस्थः कुरु कर्माणि