श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 25
अध्याय 2 – सांख्ययोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
avyakto.ayamacintyo.ayamavikāryo.ayamucyate .
tasmādevaṃ viditvainaṃ nānuśocitumarhasi ॥
अर्थ
यह आत्मा अव्यक्त (इन्द्रियों से अगोचर), अचिन्त्य (मन से न सोचा जा सकने वाला) और अविकारी (कभी न बदलने वाला) कहा जाता है। इसलिए इसे ऐसा जानकर तुम्हें शोक करना उचित नहीं है
शब्दार्थ
- अव्यक्तः – अव्यक्त, इन्द्रियों से न जाना जा सकने वाला
- अयम् – यह
- अचिन्त्यः – अचिन्त्य, मन से परे
- अविकार्यः – विकार-रहित, अपरिवर्तनशील
- उच्यते – कहा जाता है
- तस्मात् – इसलिए
- एवम् – इस प्रकार
- विदित्वा – जानकर
- एनम् – इसको
- न अनुशोचितुम् – शोक करने के लिए नहीं
- अर्हसि – योग्य हो
अन्वय
अयम् अव्यक्तः, अयम् अचिन्त्यः, अयम् अविकार्यः उच्यते । तस्मात् एनम् एवं विदित्वा (त्वम्) अनुशोचितुं न अर्हसि ।
व्याख्या
आत्मा के स्वरूप-वर्णन का यह श्लोक एक प्रकार से उपसंहार है। श्रीकृष्ण तीन और विशेषण देते हैं और फिर निष्कर्ष निकालते हैं कि ऐसे आत्मा को जानकर शोक करना उचित नहीं।
‘अव्यक्त’ — आत्मा इन्द्रियों का विषय नहीं है। हम रंग आँखों से देखते हैं, ध्वनि कानों से सुनते हैं, पर आत्मा को किसी इन्द्रिय से नहीं जाना जा सकता, क्योंकि वह स्वयं इन्द्रियों को देखने-सुनने की शक्ति देता है। ‘अचिन्त्य’ — आत्मा मन की कल्पना का विषय भी नहीं है। मन जिसे सोचता है, वह विषय बन जाता है; परन्तु आत्मा सोचने वाला है, सोचा जाने वाला नहीं। ‘अविकार्य’ — आत्मा में कोई विकार, कोई परिवर्तन नहीं होता। दूध दही बन जाता है, लकड़ी राख बन जाती है, परन्तु आत्मा सदा वैसा ही रहता है।
यहाँ एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है: यदि आत्मा अव्यक्त और अचिन्त्य है, तो उसे जाना कैसे जाए? आचार्य शंकर का उत्तर है कि आत्मा किसी विषय की भाँति नहीं जाना जाता, बल्कि शास्त्र और गुरु के उपदेश से, जब अनात्म वस्तुओं से तादात्म्य हटता है, तब वह स्वयं-प्रकाश रूप में अनुभूत होता है।
‘तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि’ — इसलिए ऐसा जानकर शोक करना तुम्हारे योग्य नहीं। यहाँ आत्म-विषयक तर्क (2.11 से आरम्भ) अपने एक निष्कर्ष पर पहुँचता है। अगले श्लोकों में श्रीकृष्ण एक दूसरी दृष्टि से भी यही बात सिद्ध करेंगे।
प्रसंग
2.24 में श्रीकृष्ण ने आत्मा को नित्य, सर्वव्यापी और अचल बताया। यहाँ वे उसे अव्यक्त, अचिन्त्य और अविकारी कहकर शोक न करने का निष्कर्ष देते हैं। अगले श्लोक (2.26) में वे कहते हैं कि यदि आत्मा को जन्म-मृत्यु वाला भी मानो, तब भी शोक उचित नहीं।
जीवन-शिक्षा
हमारा वास्तविक स्वरूप इन्द्रियों और विचारों से परे है। जब हम स्वयं को केवल अपने विचारों और भावनाओं से नहीं पहचानते, तब मन की उथल-पुथल हमें उतना विचलित नहीं करती।
मुख्य शब्द
- अव्यक्त
- जो इन्द्रियों से प्रकट या ज्ञात न हो
- अचिन्त्य
- जो मन की सोच का विषय न हो
- अविकार्य
- जिसमें कोई परिवर्तन न हो
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 2.20 – न जायते म्रियते
- गीता 2.21 – वेदाविनाशिनं नित्यं य
- गीता 2.22 – वासांसि जीर्णानि यथा
- गीता 2.23 – नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि
- गीता 2.24 – अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च
- गीता 2.26 – अथ चैनं नित्यजातं
- गीता 2.27 – जातस्य हि ध्रुवो
- गीता 2.28 – अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि
- गीता 2.29 – आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन-
- गीता 2.30 – देही नित्यमवध्योऽयं देहे