भगवद् गीता वर्ल्ड

श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 41

अध्याय 2 – सांख्ययोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

vyavasāyātmikā buddhirekeha kurunandana .
bahuśākhā hyanantāśca buddhayo.avyavasāyinām ॥

अर्थ

हे कुरुनन्दन! इस (कर्मयोग के) मार्ग में निश्चयात्मक बुद्धि एक ही होती है; किन्तु जिनका कोई निश्चय नहीं, उनकी बुद्धियाँ अनेक शाखाओं वाली और अनन्त होती हैं

शब्दार्थ

  • व्यवसायात्मिका – निश्चयात्मक, दृढ़ संकल्प वाली
  • बुद्धिः – बुद्धि
  • एका – एक ही
  • इह – इस (मार्ग) में
  • कुरुनन्दन – हे कुरुवंश को आनन्दित करने वाले
  • बहुशाखाः – अनेक शाखाओं वाली
  • हि – क्योंकि
  • अनन्ताः – अनन्त, असंख्य
  • च – और
  • बुद्धयः – बुद्धियाँ, विचार
  • अव्यवसायिनाम् – अनिश्चित बुद्धि वालों की

अन्वय

कुरुनन्दन, इह व्यवसायात्मिका बुद्धिः एका (भवति); अव्यवसायिनां बुद्धयः हि बहुशाखाः अनन्ताः च (भवन्ति) ।

व्याख्या

कर्मयोग की पहली विशेषता है — ‘व्यवसायात्मिका बुद्धि’ — निश्चयात्मक, एकाग्र बुद्धि। श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस मार्ग पर चलने वाले की बुद्धि एक ही लक्ष्य पर स्थिर होती है: ईश्वर-प्राप्ति या आत्म-शुद्धि। उसके सारे कर्म उसी एक लक्ष्य की ओर बहते हैं, जैसे अनेक नदियाँ एक ही समुद्र की ओर।

इसके विपरीत जिनकी बुद्धि में निश्चय नहीं, उनकी बुद्धि ‘बहुशाखा’ — अनेक शाखाओं वाली — होती है। एक इच्छा पूरी हुई तो दूसरी उग आती है, और एक-एक इच्छा से अनेक नई इच्छाएँ फूट निकलती हैं, जैसे एक वृक्ष की शाखाओं से अनगिनत टहनियाँ। ऐसा मन कभी शान्त नहीं होता, क्योंकि उसकी दिशाएँ ‘अनन्त’ हैं।

आचार्य शंकर स्पष्ट करते हैं कि यह निश्चयात्मक बुद्धि सही प्रमाण — शास्त्र और गुरु के उपदेश — से उत्पन्न होती है, और वह अनेक विरोधी विचारों का नाश कर देती है। रामानुजाचार्य कहते हैं कि मोक्ष के लिए किए गए सभी कर्मों में बुद्धि एक ही होती है — आत्म-प्राप्ति; जबकि फल चाहने वालों की बुद्धियाँ हर फल के लिए अलग-अलग होती हैं।

यह श्लोक आधुनिक जीवन के लिए एक बहुत महत्त्वपूर्ण सूत्र है। जो व्यक्ति दस दिशाओं में दौड़ता है, वह कहीं नहीं पहुँचता। स्पष्ट लक्ष्य और एकाग्र मन ही सफलता — लौकिक और आध्यात्मिक दोनों — की कुंजी है।

प्रसंग

2.40 में श्रीकृष्ण ने बताया कि कर्मयोग में कोई प्रयास व्यर्थ नहीं जाता। यहाँ वे इसकी पहली शर्त बताते हैं — निश्चयात्मक बुद्धि। अगले श्लोकों (2.42–2.44) में वे उन लोगों का वर्णन करते हैं जिनकी बुद्धि भोगों की कामना से बिखरी रहती है।

जीवन-शिक्षा

जीवन में एक स्पष्ट, उच्च लक्ष्य निश्चित कीजिए और अपनी ऊर्जा को उसी पर केन्द्रित कीजिए। अनगिनत इच्छाओं में बँटा मन कभी शान्ति या सच्ची उपलब्धि नहीं पाता।

मुख्य शब्द

व्यवसायात्मिका बुद्धि
निश्चयात्मक, एकाग्र बुद्धि
बहुशाखा
अनेक शाखाओं वाली, बिखरी हुई
अव्यवसायी
जिसका कोई दृढ़ निश्चय न हो

इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक

श्रीकृष्ण से जुड़ी सामग्री

लोकप्रिय गीता श्लोक