श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 1
अध्याय 2 – सांख्ययोग · वक्ता: संजय
संस्कृत श्लोक
सञ्जय उवाच ।
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
sañjaya uvāca .
taṃ tathā kṛpayāviṣṭamaśrupūrṇākulekṣaṇam .
viṣīdantamidaṃ vākyamuvāca madhusūdanaḥ ॥
अर्थ
संजय ने कहा — इस प्रकार करुणा से घिरे हुए, आँसुओं से भरे और व्याकुल नेत्रों वाले, शोक में डूबे हुए उस अर्जुन से भगवान मधुसूदन ने ये वचन कहे
शब्दार्थ
- तम् – उस (अर्जुन) से
- तथा – उस प्रकार
- कृपया – करुणा से, दया-भाव से
- आविष्टम् – घिरे हुए, आवेशित
- अश्रुपूर्ण – आँसुओं से भरे हुए
- आकुल-ईक्षणम् – व्याकुल नेत्रों वाले
- विषीदन्तम् – विषाद करते हुए, शोक में डूबे
- इदम् – यह
- वाक्यम् – वचन
- उवाच – कहा
- मधुसूदनः – मधु दैत्य को मारने वाले — श्रीकृष्ण
अन्वय
सञ्जयः उवाच — तथा कृपया आविष्टम् अश्रुपूर्णाकुलेक्षणं विषीदन्तं तम् (अर्जुनम्) मधुसूदनः इदं वाक्यम् उवाच ।
व्याख्या
पहले अध्याय के अंत में अर्जुन धनुष-बाण रखकर रथ के पिछले भाग में बैठ गया था। दूसरे अध्याय का आरम्भ संजय के इस वर्णन से होता है, जो उसी दृश्य को आगे बढ़ाता है। संजय अर्जुन की दशा का तीन शब्दों में सटीक चित्र खींचते हैं — वह कृपा से आविष्ट है, उसकी आँखें आँसुओं से भरी और व्याकुल हैं, और वह विषाद कर रहा है।
‘कृपया आविष्टम्’ — यह शब्द-प्रयोग विशेष ध्यान देने योग्य है। अर्जुन ने करुणा को धारण नहीं किया, बल्कि करुणा ने अर्जुन को घेर लिया है; अर्थात् वह भावना का स्वामी नहीं, उसका वशवर्ती बन गया है। आचार्य शंकर इस करुणा को मोह और शोक से उत्पन्न मानते हैं — यह आत्मज्ञान से उपजी सच्ची दया नहीं, बल्कि ‘ये मेरे हैं’ इस ममता से उपजी दुर्बलता है। जो दया विवेक से रहित होती है, वह कर्तव्य से भी दूर ले जाती है।
यहाँ श्रीकृष्ण को ‘मधुसूदन’ कहा गया है — मधु नामक असुर का संहार करने वाले। यह नाम संकेत देता है कि जो भगवान बाहरी असुरों का नाश करते हैं, वे अब अर्जुन के भीतर के मोह-रूपी असुर का नाश करने वाले हैं। गीता का वास्तविक उपदेश अब यहीं से प्रारम्भ होता है।
यह श्लोक एक बड़ा सत्य भी बताता है — ज्ञान की प्यास प्रायः संकट के क्षण में ही जागती है। जब मनुष्य की अपनी बुद्धि थक जाती है और वह आँसुओं के साथ ठहर जाता है, तभी वह गुरु की वाणी सुनने के योग्य बनता है।
प्रसंग
पहले अध्याय (1.47) में अर्जुन शोक से व्याकुल होकर रथ में बैठ गया था। यह श्लोक उसी स्थिति को आगे बढ़ाता है और संजय धृतराष्ट्र को बताते हैं कि अब श्रीकृष्ण बोलने वाले हैं। अगले श्लोक (2.2) से श्रीकृष्ण का पहला वचन आरम्भ होता है।
जीवन-शिक्षा
भावनाएँ अच्छी हैं, परन्तु जब वे विवेक को ढक लें तो वे दुर्बलता बन जाती हैं। संकट के क्षण में घबराकर निर्णय लेने के बजाय किसी ज्ञानी मार्गदर्शक की ओर मुड़ना ही बुद्धिमानी है।
मुख्य शब्द
- कृपा
- करुणा; यहाँ ममता से उत्पन्न मोहयुक्त दया
- विषाद
- गहरा शोक और निराशा
- मधुसूदन
- मधु दैत्य का वध करने वाले — श्रीकृष्ण का नाम