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श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 40

अध्याय 2 – सांख्ययोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

nehābhikramanāśo.asti pratyavāyo na vidyate .
svalpamapyasya dharmasya trāyate mahato bhayāt ॥

अर्थ

इस (कर्मयोग के) मार्ग में किए गए आरम्भ का कभी नाश नहीं होता और इसमें उलटा फल (दोष) भी नहीं होता। इस धर्म का थोड़ा-सा पालन भी महान भय से रक्षा करता है

शब्दार्थ

  • न – नहीं
  • इह – इस (मार्ग) में
  • अभिक्रमनाशः – आरम्भ किए गए प्रयास का नाश
  • अस्ति – है
  • प्रत्यवायः – विपरीत फल, दोष
  • न विद्यते – नहीं होता
  • स्वल्पम् – थोड़ा-सा
  • अपि – भी
  • अस्य – इस
  • धर्मस्य – धर्म (कर्मयोग) का
  • त्रायते – रक्षा करता है
  • महतः – महान
  • भयात् – भय से

अन्वय

इह अभिक्रमनाशः न अस्ति, प्रत्यवायः न विद्यते । अस्य धर्मस्य स्वल्पम् अपि महतः भयात् त्रायते ।

व्याख्या

कर्मयोग का उपदेश आरम्भ करने से पहले श्रीकृष्ण इस मार्ग की एक अद्भुत विशेषता बताते हैं, ताकि अर्जुन — और हर साधक — उत्साह से इस पर चल सके। वे तीन आश्वासन देते हैं।

पहला — ‘नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति’ — इसमें किए गए आरम्भ का नाश नहीं होता। सामान्य कर्मों में, जैसे कोई यज्ञ या अनुष्ठान, यदि वह बीच में छूट जाए तो उसका कोई फल नहीं मिलता — जैसे आधा बना घर रहने योग्य नहीं होता। परन्तु कर्मयोग में किया गया हर छोटा प्रयास मन को शुद्ध करता है, और वह शुद्धि कभी व्यर्थ नहीं जाती।

दूसरा — ‘प्रत्यवायो न विद्यते’ — इसमें कोई उलटा परिणाम नहीं होता। वैदिक अनुष्ठानों में यदि मन्त्र या विधि में त्रुटि हो जाए तो विपरीत फल का भय रहता है। निष्काम कर्मयोग में ऐसा कोई भय नहीं, क्योंकि यहाँ बाहरी विधि नहीं, भीतरी भाव मुख्य है।

तीसरा — ‘स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्’ — इस धर्म का थोड़ा-सा पालन भी महान भय से बचाता है। आचार्य शंकर के अनुसार ‘महान भय’ है जन्म-मृत्यु के संसार का भय। थोड़ी-सी निष्काम भावना भी व्यक्ति को उस दिशा में ले जाती है जहाँ अन्ततः मुक्ति है।

यह श्लोक हर उस व्यक्ति के लिए आशा का सन्देश है जो सोचता है कि आध्यात्मिक जीवन बहुत कठिन है। आपको पूर्ण होकर आरम्भ नहीं करना है; आरम्भ करके ही आप पूर्णता की ओर बढ़ते हैं। हर छोटा निःस्वार्थ कर्म एक बीज है जो समय आने पर फल देगा।

प्रसंग

2.39 में श्रीकृष्ण ने योग-बुद्धि का उपदेश देने की घोषणा की। यहाँ वे बताते हैं कि इस मार्ग में कोई प्रयास व्यर्थ नहीं जाता। अगले श्लोक (2.41) में वे बताते हैं कि इस मार्ग में बुद्धि एकनिष्ठ होती है।

जीवन-शिक्षा

आध्यात्मिक मार्ग पर हर छोटा कदम मूल्यवान है। पूर्ण होने की प्रतीक्षा मत कीजिए; आज से थोड़ा-सा निःस्वार्थ कर्म आरम्भ कीजिए — वह कभी व्यर्थ नहीं जाएगा।

मुख्य शब्द

अभिक्रम
आरम्भ, प्रयास
प्रत्यवाय
विपरीत फल, दोष या हानि
महद् भय
महान भय — जन्म-मृत्यु के संसार का भय

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