श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 65
अध्याय 2 – सांख्ययोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
prasāde sarvaduḥkhānāṃ hānirasyopajāyate .
prasannacetaso hyāśu buddhiḥ paryavatiṣṭhate ॥
अर्थ
उस प्रसाद (अन्तःकरण की निर्मलता) के प्राप्त होने पर उसके सब दुःखों का नाश हो जाता है; क्योंकि प्रसन्नचित्त पुरुष की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर (परमात्मा में) भली-भाँति स्थिर हो जाती है
शब्दार्थ
- प्रसादे – प्रसाद (निर्मलता) होने पर
- सर्वदुःखानाम् – सब दुःखों का
- हानिः – नाश, अन्त
- अस्य – इसके (साधक के)
- उपजायते – हो जाता है
- प्रसन्नचेतसः – प्रसन्न (निर्मल) चित्त वाले की
- हि – क्योंकि
- आशु – शीघ्र ही
- बुद्धिः – बुद्धि
- पर्यवतिष्ठते – सब ओर से भली-भाँति स्थिर हो जाती है
अन्वय
प्रसादे (सति) अस्य सर्वदुःखानां हानिः उपजायते; हि प्रसन्नचेतसः बुद्धिः आशु पर्यवतिष्ठते ।
व्याख्या
पिछले श्लोक में बताया गया कि राग-द्वेष से मुक्त होकर विषयों में विचरने वाला ‘प्रसाद’ पाता है। अब श्रीकृष्ण इस प्रसाद के दो महान फल बताते हैं — पहला, सब दुःखों का अन्त; दूसरा, बुद्धि की शीघ्र और पूर्ण स्थिरता। यह श्लोक पतन की सीढ़ी (2.62–63) के ठीक विपरीत, उत्थान की सीढ़ी का शिखर दिखाता है।
पहला फल — ‘सर्वदुःखानां हानिः’ — सब दुःखों का नाश। यह बहुत बड़ा वचन है। ध्यान दें, श्रीकृष्ण यह नहीं कहते कि प्रतिकूल परिस्थितियाँ आनी बन्द हो जाएँगी। शरीर में रोग आ सकता है, संसार में हानि हो सकती है। परन्तु दुःख का वास्तविक स्थान मन है, परिस्थिति नहीं। जब मन निर्मल और राग-द्वेष से मुक्त हो जाता है, तो परिस्थितियाँ उसे घायल नहीं कर पातीं। जैसे स्वच्छ आकाश में धूल उड़ती तो है, पर आकाश मैला नहीं होता। आचार्य शंकर कहते हैं कि यहाँ ‘दुःख’ से आध्यात्मिक आदि तीनों प्रकार के दुःख अभिप्रेत हैं।
दूसरा फल — ‘प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते’ — प्रसन्नचित्त की बुद्धि शीघ्र स्थिर हो जाती है। ‘परि+अव+तिष्ठते’ — सब ओर से हटकर, भली-भाँति, पूर्ण रूप से स्थित होना। आचार्य शंकर इसका अर्थ करते हैं — बुद्धि आकाश की तरह सब ओर से अचल होकर आत्मस्वरूप में ही स्थित हो जाती है। और ‘आशु’ — शीघ्र ही। निर्मल मन में बुद्धि को स्थिर होने में देर नहीं लगती, जैसे शान्त जल में चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब तुरन्त स्पष्ट दिखने लगता है।
यहाँ कारण-कार्य का एक सुन्दर चक्र दिखता है: इन्द्रिय-संयम से प्रसाद, प्रसाद से दुःख-नाश और बुद्धि की स्थिरता, और स्थिर बुद्धि से और गहरा संयम। जैसे पतन की सीढ़ी में एक दोष दूसरे दोष को जन्म देता था, वैसे ही उत्थान की सीढ़ी में एक गुण दूसरे गुण को पुष्ट करता है।
जीवन में इसका अर्थ यह है कि स्पष्ट सोच और अच्छे निर्णय के लिए पहले मन का शान्त होना आवश्यक है। उत्तेजित, चिन्तित या कुण्ठित मन से लिया गया निर्णय प्रायः ग़लत होता है। जब हम अपने भीतर निर्मलता लाते हैं, तब समाधान स्वयं स्पष्ट दिखने लगते हैं।
प्रसंग
2.64 में बताया गया कि वश में की हुई इन्द्रियों से विचरने वाला प्रसाद पाता है। यह श्लोक उस प्रसाद के फल — दुःख-नाश और बुद्धि की स्थिरता — का वर्णन करता है। अगले श्लोक (2.66) में श्रीकृष्ण इसका उलटा पक्ष दिखाते हैं — अयुक्त (असंयमी) को न बुद्धि मिलती है, न शान्ति, न सुख।
जीवन-शिक्षा
दुःख का मूल स्थान परिस्थिति नहीं, मन है। पहले मन को निर्मल और शान्त कीजिए; शान्त मन में बुद्धि स्वयं स्पष्ट हो जाती है और सही निर्णय सहज निकलते हैं।
मुख्य शब्द
- प्रसाद
- चित्त की निर्मलता और शान्त प्रसन्नता
- प्रसन्नचेता
- जिसका चित्त निर्मल और प्रसन्न है
- पर्यवस्थान
- बुद्धि का सब ओर से हटकर पूर्ण रूप से स्थिर होना
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 2.60 – यततो ह्यपि कौन्तेय
- गीता 2.61 – तानि सर्वाणि संयम्य
- गीता 2.62 – ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते
- गीता 2.63 – क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः
- गीता 2.64 – रागद्वेषविमुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्
- गीता 2.66 – नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न
- गीता 2.67 – इन्द्रियाणां हि चरतां
- गीता 2.68 – तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि
- गीता 2.69 – या निशा सर्वभूतानां
- गीता 2.70 – आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं