श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 42
अध्याय 2 – सांख्ययोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
yāmimāṃ puṣpitāṃ vācaṃ pravadantyavipaścitaḥ .
vedavādaratāḥ pārtha nānyadastīti vādinaḥ ॥
अर्थ
हे पार्थ! जो अविवेकी लोग वेदों के (कर्मकाण्ड-सम्बन्धी) वचनों में ही रमे रहते हैं और कहते हैं कि ‘इसके अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं’, वे इस प्रकार की दिखावटी, फूलों जैसी आकर्षक वाणी बोलते हैं —
शब्दार्थ
- याम् – जिस
- इमाम् – इस
- पुष्पिताम् – फूलों जैसी, दिखावटी, आकर्षक
- वाचम् – वाणी को
- प्रवदन्ति – कहते हैं
- अविपश्चितः – अविवेकी, अल्पज्ञ
- वेदवादरताः – वेदों के (फलश्रुति वाले) वचनों में रमे हुए
- पार्थ – हे पार्थ
- न अन्यत् अस्ति – और कुछ नहीं है
- इति – ऐसा
- वादिनः – कहने वाले
अन्वय
पार्थ, वेदवादरताः ‘अन्यत् न अस्ति’ इति वादिनः अविपश्चितः याम् इमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्ति — (वाक्यम् 2.44 श्लोके समाप्यते) ।
व्याख्या
निश्चयात्मक बुद्धि की बात करने के बाद श्रीकृष्ण अब उन लोगों का वर्णन करते हैं जिनकी बुद्धि भटकी हुई है। श्लोक 2.42 से 2.44 तक एक ही वाक्य है, जिसका मुख्य कथन 2.44 में पूरा होता है। यहाँ वे ‘वेदवादरत’ लोगों की बात करते हैं — जो वेदों के केवल उस भाग में रमे हैं जो विभिन्न अनुष्ठानों से मिलने वाले स्वर्ग और भोगों का वर्णन करता है।
‘पुष्पितां वाचम्’ — फूलों जैसी वाणी — यह एक सुन्दर उपमा है। फूल देखने में सुन्दर होते हैं, सुगन्धित होते हैं, परन्तु शीघ्र ही मुरझा जाते हैं। इसी प्रकार स्वर्ग और भोगों के वादे सुनने में आकर्षक लगते हैं, परन्तु उनका फल अस्थायी है। आचार्य शंकर इसकी तुलना विषैले पेड़ के फूलों से करते हैं जो देखने में सुन्दर पर परिणाम में हानिकारक होते हैं।
‘नान्यदस्तीति वादिनः’ — वे कहते हैं कि इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं। यही उनकी सबसे बड़ी भूल है। वे वेदों के कर्मकाण्ड को ही अन्तिम सत्य मान लेते हैं और उपनिषदों में वर्णित आत्मज्ञान और मोक्ष को अनदेखा कर देते हैं।
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि श्रीकृष्ण वेदों की निन्दा नहीं कर रहे। सभी आचार्य इस बात पर एकमत हैं कि यहाँ आलोचना वेदों की नहीं, बल्कि उनके अधूरे और भोगवादी अर्थ की है। वेद स्वयं कर्मकाण्ड को चित्त-शुद्धि का साधन और ज्ञान को अन्तिम लक्ष्य बताते हैं। समस्या तब होती है जब साधन को ही साध्य मान लिया जाए।
आज भी धर्म के नाम पर केवल बाहरी अनुष्ठानों और भौतिक लाभ की कामना को ही सब कुछ मान लेना वही भूल है। सच्चा धर्म हमें भोग से ऊपर उठाकर आत्म-विकास की ओर ले जाता है।
प्रसंग
2.41 में श्रीकृष्ण ने निश्चयात्मक और बिखरी बुद्धि का भेद बताया। यहाँ से (2.42–2.44) वे भोगवादी, कर्मकाण्ड-केन्द्रित लोगों का वर्णन आरम्भ करते हैं। अगले श्लोक (2.43) में उनकी कामनाओं का और 2.44 में उनकी बुद्धि की दशा का वर्णन है।
जीवन-शिक्षा
धर्म के नाम पर केवल भौतिक लाभ के वादों में मत उलझिए। आकर्षक बातें प्रायः क्षणिक सुख की ओर ले जाती हैं; सच्चा धर्म आन्तरिक विकास और आत्मज्ञान की ओर ले जाता है।
मुख्य शब्द
- पुष्पिता वाक्
- फूलों जैसी आकर्षक किन्तु क्षणिक फल वाली वाणी
- वेदवादरत
- वेदों के केवल फलश्रुति वाले वचनों में आसक्त
- अविपश्चित्
- अविवेकी, जिसमें गहरी समझ न हो
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 2.37 – हतो वा प्राप्स्यसि
- गीता 2.38 – सुखदुःखे समे कृत्वा
- गीता 2.39 – एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये
- गीता 2.40 – नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न
- गीता 2.41 – व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन
- गीता 2.43 – कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्
- गीता 2.44 – भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्
- गीता 2.45 – त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो
- गीता 2.46 – यावानर्थ उदपाने सर्वतः
- गीता 2.47 – कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु