श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 23
अध्याय 2 – सांख्ययोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
nainaṃ chindanti śastrāṇi nainaṃ dahati pāvakaḥ .
na cainaṃ kledayantyāpo na śoṣayati mārutaḥ ॥
अर्थ
इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल गीला नहीं कर सकता और वायु सुखा नहीं सकती
शब्दार्थ
- न – नहीं
- एनम् – इस (आत्मा) को
- छिन्दन्ति – काटते हैं
- शस्त्राणि – शस्त्र
- दहति – जलाता है
- पावकः – अग्नि
- च – और
- क्लेदयन्ति – गीला करते हैं, गलाते हैं
- आपः – जल
- शोषयति – सुखाता है
- मारुतः – वायु
अन्वय
शस्त्राणि एनं न छिन्दन्ति, पावकः एनं न दहति, आपः च एनं न क्लेदयन्ति, मारुतः (एनं) न शोषयति ।
व्याख्या
आत्मा की अविनाशिता को और स्पष्ट करने के लिए श्रीकृष्ण अब उन सभी साधनों का निषेध करते हैं जिनसे संसार में किसी वस्तु का नाश होता है। कोई वस्तु या तो काटी जाती है, या जलाई जाती है, या पानी से गलाई जाती है, या हवा से सुखाई जाती है। आत्मा पर इनमें से कोई भी प्रभाव नहीं डाल सकता।
यहाँ पाँच महाभूतों में से चार का उल्लेख है — पृथ्वी (शस्त्र, जो ठोस धातु के बने हैं), अग्नि, जल और वायु। पाँचवाँ आकाश है, जो स्वयं सब कुछ धारण करता है और किसी को नष्ट नहीं करता। अर्थ यह है कि सम्पूर्ण भौतिक जगत् की कोई भी शक्ति आत्मा तक नहीं पहुँच सकती, क्योंकि आत्मा भौतिक नहीं है।
अर्जुन के सन्दर्भ में यह श्लोक विशेष रूप से सार्थक है। वह शस्त्रों से युद्ध करने वाला है। श्रीकृष्ण कहते हैं — तुम्हारे शस्त्र, यहाँ तक कि अग्नि-अस्त्र, वरुण-अस्त्र और वायव्य-अस्त्र जैसे दिव्यास्त्र भी, आत्मा का कुछ नहीं बिगाड़ सकते। वे केवल शरीर को प्रभावित करते हैं।
आचार्य शंकर कहते हैं कि आत्मा निरवयव (अंग-रहित) है, इसलिए उसे काटा नहीं जा सकता; और वह सूक्ष्मतम है, इसलिए कोई भौतिक तत्त्व उसे स्पर्श नहीं कर सकता। यह समझ भय को जड़ से मिटाती है — जो हम वास्तव में हैं, वह सदा सुरक्षित है।
प्रसंग
2.22 में श्रीकृष्ण ने वस्त्र-परिवर्तन के उदाहरण से देहान्तर समझाया। यहाँ वे बताते हैं कि कोई भी भौतिक तत्त्व आत्मा को हानि नहीं पहुँचा सकता। अगले श्लोक (2.24) में वे इसी बात को आत्मा के गुणों के रूप में दोहराते हैं।
जीवन-शिक्षा
संसार की कोई भी शक्ति आपके वास्तविक स्वरूप को चोट नहीं पहुँचा सकती। कठिन परिस्थितियों में यह स्मरण भीतरी दृढ़ता और साहस देता है।
मुख्य शब्द
- पावक
- अग्नि, जो पवित्र करती है
- मारुत
- वायु
- निरवयव
- अंग-रहित, अखण्ड
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 2.18 – अन्तवन्त इमे देहा
- गीता 2.19 – य एनं वेत्ति
- गीता 2.20 – न जायते म्रियते
- गीता 2.21 – वेदाविनाशिनं नित्यं य
- गीता 2.22 – वासांसि जीर्णानि यथा
- गीता 2.24 – अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च
- गीता 2.25 – अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते
- गीता 2.26 – अथ चैनं नित्यजातं
- गीता 2.27 – जातस्य हि ध्रुवो
- गीता 2.28 – अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि