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गुजरात में पुष्टिमार्ग

श्री वल्लभाचार्य जी का पुष्टिमार्ग गुजरात के वैष्णव परिवारों का जीवन है – हवेलियों में ठाकुर जी की आठ झाँकियों की सेवा, सामग्री और अष्टछाप कीर्तन।

पुष्टिमार्ग श्री वल्लभाचार्य जी (1479–1531) द्वारा प्रवर्तित भक्ति-मार्ग है। "पुष्टि" का अर्थ है भगवान का अनुग्रह; इस मार्ग में भक्त अपने प्रयत्न से नहीं, बल्कि प्रभु की कृपा पर भरोसा रखकर, श्रीकृष्ण को अपना सर्वस्व मानकर उनकी सेवा करता है। इसका मूल मंत्र "श्रीकृष्णः शरणं मम" है। वल्लभाचार्य जी ने पूरे भारत की यात्राएँ कीं और अनेक स्थानों पर भागवत का प्रवचन किया; ये स्थान "बैठक जी" कहलाते हैं, और इनमें से कई गुजरात में हैं।

उनके पुत्र श्री विट्ठलनाथ जी, जिन्हें प्रेम से गुसाईं जी कहा जाता है, ने सेवा-पद्धति को शृंगार, राग और भोग की अद्भुत सुंदरता दी। परंपरा के अनुसार गुसाईं जी कई बार गुजरात पधारे और बहुत-से गुजराती परिवार उनके शिष्य बने। आज पुष्टिमार्ग के प्रधान स्वरूप श्रीनाथ जी नाथद्वारा (राजस्थान) में विराजते हैं, और गुजरात के वैष्णवों के लिए नाथद्वारा की यात्रा जीवन का बड़ा सौभाग्य है।

गुजरात के लगभग हर नगर में पुष्टिमार्गीय हवेलियाँ हैं। इन्हें मंदिर नहीं, हवेली कहा जाता है, क्योंकि यहाँ ठाकुर जी को घर के लाडले बालक की तरह रखा जाता है। दिन भर की सेवा आठ दर्शनों में बँटी होती है: मंगला (भोर में जगाना), शृंगार (वस्त्र-आभूषण धारण), ग्वाल (गायें चराने जाने का भाव), राजभोग (दोपहर का मुख्य भोग), उत्थापन (विश्राम के बाद जगाना), भोग (संध्या से पहले का भोग), संध्या-आरती और शयन। ऋतु और उत्सव के अनुसार ठाकुर जी के वस्त्र, शृंगार और सामग्री, यानी भोग में अर्पित व्यंजन, बदलते रहते हैं।

हर दर्शन के साथ कीर्तन होता है, जिसमें प्रायः अष्टछाप कवियों – सूरदास, कुंभनदास, परमानंददास, कृष्णदास, नंददास, चतुर्भुजदास, छीतस्वामी और गोविंदस्वामी – के पद गाए जाते हैं। अनेक गुजराती वैष्णव परिवार घर में भी ठाकुर जी की सेवा करते हैं, और हिंडोला, अन्नकूट और जन्माष्टमी जैसे उत्सव पूरे परिवार को भक्ति के एक सूत्र में बाँध देते हैं।

District
Gujarat (statewide)

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