भक्त कवि नरसिंह मेहता
पंद्रहवीं शताब्दी के जूनागढ़ के भक्त कवि, गुजराती के आदि कवि, जिनकी प्रभातियाँ और "वैष्णव जन तो" आज भी हर गुजराती के हृदय में बसते हैं।
नरसिंह मेहता पंद्रहवीं शताब्दी के महान कृष्ण-भक्त और कवि थे, जिन्हें गुजराती भाषा का आदि कवि कहा जाता है। परंपरा के अनुसार उनका जन्म तलाजा में एक नागर ब्राह्मण परिवार में हुआ और उनका अधिकांश जीवन जूनागढ़ में बीता। बचपन में ही माता-पिता का साया उठ गया और वे भाई-भाभी के साथ रहे। कथा है कि एक दिन भाभी के कड़वे ताने से आहत होकर वे वन में एक पुराने शिवालय में जा बैठे और भूखे-प्यासे शिव जी की आराधना करते रहे। प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें श्रीकृष्ण के रास के दर्शन कराए। उसी दिन से उनका जीवन कृष्ण-कीर्तन को समर्पित हो गया।
उनकी प्रभातियाँ, यानी भोर के समय गाए जाने वाले पद, आज भी गुजरात के घरों में सुबह-सवेरे गूँजती हैं। उनका सबसे प्रसिद्ध भजन "वैष्णव जन तो" बताता है कि सच्चा वैष्णव वही है जो दूसरों की पीड़ा को अपनी समझे, उपकार करके भी अभिमान न करे और सबका आदर करे। यह भजन महात्मा गांधी को अत्यंत प्रिय था।
परंपरा में ऐसी कई कथाएँ हैं जिनमें भगवान ने स्वयं आकर अपने भक्त की लाज रखी। बेटी कुँवरबाई के मामेरे के समय, जब निर्धन नरसिंह के पास देने को कुछ नहीं था, तब श्रीकृष्ण शामलशा सेठ बनकर आए और भरपूर उपहार दे गए। एक बार कुछ यात्रियों ने द्वारका जाने के लिए उन्हें धन देकर हुंडी लिखवाई; नरसिंह ने द्वारका के "शामलशा सेठ" के नाम हुंडी लिख दी, और कथा के अनुसार भगवान ने स्वयं सेठ बनकर वह हुंडी चुकाई। राजा रा' मांडलिक के दरबार में भगवान द्वारा उन्हें हार पहनाने की कथा भी प्रसिद्ध है।
जूनागढ़ में गिरनार की तलहटी में स्थित दामोदर कुंड के बारे में परंपरा है कि नरसिंह मेहता यहाँ नित्य स्नान करते थे। नगर में "नरसिंह मेहता का चोरा" भी है, जहाँ वे भजन-कीर्तन करते थे। भक्त इन स्थानों पर आकर उस निर्भय, निष्कपट भक्ति को प्रणाम करते हैं।
- District
- Junagadh (born at Talaja, Bhavnagar district, by tradition)