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मीराबाई और द्वारका

गिरधर गोपाल की दीवानी मीराबाई ने परंपरा के अनुसार अपने अंतिम वर्ष द्वारका में बिताए और रणछोड़राय के विग्रह में समा गईं।

मीराबाई सोलहवीं शताब्दी की महान कृष्ण-भक्त संत-कवयित्री थीं। उनका जन्म राजस्थान के मेड़ता के राठौड़ राजपरिवार में हुआ और विवाह मेवाड़ के राजपरिवार में। परंपरा कहती है कि बचपन में ही उन्होंने गिरधर गोपाल की मूर्ति को अपना सर्वस्व मान लिया था, और राजमहल का वैभव भी उनके इस प्रेम को कम न कर सका। साधुओं की संगति और खुले कीर्तन के कारण उन्हें ससुराल में बहुत विरोध सहना पड़ा। लोक-कथाओं में विष के प्याले के अमृत बन जाने जैसी घटनाएँ बताई जाती हैं, जिन्हें भक्त भगवान की रक्षा का प्रमाण मानते हैं।

अंततः मीराबाई ने राजमहल छोड़ दिया। वे पहले वृंदावन गईं और फिर द्वारका आ गईं, जहाँ उन्होंने अपने अंतिम वर्ष द्वारकाधीश, जिन्हें गुजरात में रणछोड़राय भी कहते हैं, की भक्ति में बिताए। परंपरा के अनुसार मेवाड़ से लोग उन्हें वापस ले जाने आए। मीरा ने कहा कि वे अंतिम बार अपने प्रभु के दर्शन कर लें; वे गर्भगृह में गईं, भजन गाते-गाते रणछोड़राय के विग्रह में समा गईं, और वहाँ केवल उनकी चुनरी रह गई। भक्त इस कथा को प्रेम-भक्ति की पराकाष्ठा मानते हैं; इतिहास की दृष्टि से इसे परंपरा ही समझना चाहिए।

मीराबाई के पद राजस्थानी और ब्रज भाषा में तो हैं ही, गुजराती में भी उनके नाम से अनेक पद गाए जाते हैं। गुजरात के घरों, मंदिरों और भजन-मंडलियों में मीरा के भजन पीढ़ियों से गूँजते रहे हैं, और उन्हें गुजराती भक्ति-परंपरा का अपना अंग माना जाता है। उनके पदों में विरह, समर्पण और "मेरे तो गिरधर गोपाल" वाली अनन्य निष्ठा का भाव है।

द्वारका आने वाले भक्त जगत मंदिर में दर्शन करते हुए मीरा को भी याद करते हैं, जिन्होंने दिखाया कि सच्चा प्रेम राजपाट, लोक-लाज और भय सबसे ऊपर है।

District
Devbhumi Dwarka

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