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द्वारका: ध्वजा, गोमती घाट और शारदा पीठ

जगत मंदिर के शिखर पर दिन में कई बार बदली जाने वाली ध्वजा, स्वर्ग द्वार से उतरती छप्पन सीढ़ियाँ, गोमती घाट और आदि शंकराचार्य की शारदा पीठ।

द्वारका के जगत मंदिर का सबसे मनमोहक दृश्य उसके ऊँचे शिखर पर लहराती ध्वजा है। यह ध्वजा दिन में कई बार बदली जाती है। भक्त परिवार किसी मनोकामना की पूर्ति या धन्यवाद के भाव से ध्वजा चढ़ाने का संकल्प लेते हैं, और इसके लिए प्रायः बहुत पहले से बुकिंग करानी पड़ती है। जिस परिवार की ध्वजा चढ़ती है, वह ढोल-शहनाई और भजन के साथ उसे शोभायात्रा में मंदिर तक लाता है। ध्वजा का पूजन होता है और फिर मंदिर के अनुभवी सेवक शिखर पर चढ़कर उसे बाँधते हैं। ध्वजा पर प्रायः सूर्य और चंद्र के चिह्न होते हैं, और लोक-भाषा में इसे "बावन गज की ध्वजा" कहा जाता है। उतारी गई पुरानी ध्वजा परिवार प्रसाद के रूप में घर ले जाता है।

मंदिर में प्रवेश के दो प्रमुख द्वार हैं। बाज़ार की ओर का मुख्य द्वार मोक्ष द्वार कहलाता है, और दूसरी ओर का स्वर्ग द्वार, जिससे छप्पन सीढ़ियाँ उतरकर गोमती नदी के घाट तक पहुँचते हैं। परंपरा है कि यात्री पहले गोमती घाट पर स्नान करें और फिर स्वर्ग द्वार की सीढ़ियाँ चढ़कर द्वारकाधीश के दर्शन करें।

गोमती घाट वह स्थान है जहाँ गोमती नदी समुद्र से मिलती है। संगम पर समुद्र नारायण का मंदिर है, और घाट पर अनेक छोटे-छोटे मंदिर और तीर्थ हैं। यहाँ भक्त स्नान, दान और पितृ-तर्पण करते हैं, और संध्या के समय घाट पर आरती और दीपों का दृश्य अत्यंत सुंदर होता है।

मंदिर के पास ही द्वारका शारदा पीठ है, जो आदि शंकराचार्य द्वारा देश की चारों दिशाओं में स्थापित चार आम्नाय पीठों में से पश्चिम की पीठ है। परंपरा से इसका संबंध सामवेद से माना जाता है। इस प्रकार द्वारका में श्रीकृष्ण-भक्ति और अद्वैत वेदांत की परंपरा एक साथ फलती-फूलती है।

District
Devbhumi Dwarka

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