ॐ जय जगदीश हरे
भगवान विष्णु (हरि) की वह आरती जो लगभग हर घर और मंदिर में गाई जाती है; 19वीं सदी में पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी द्वारा रचित।
मूल पाठ
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे ।
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे ॥ ॐ जय जगदीश हरे...
जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का, स्वामी दुःख बिनसे मन का ।
सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का ॥ ॐ जय जगदीश हरे...
मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी, स्वामी शरण गहूं मैं किसकी ।
तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी ॥ ॐ जय जगदीश हरे...
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी, स्वामी तुम अन्तर्यामी ।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी ॥ ॐ जय जगदीश हरे...
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता, स्वामी तुम पालनकर्ता ।
मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता ॥ ॐ जय जगदीश हरे...
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति, स्वामी सबके प्राणपति ।
किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति ॥ ॐ जय जगदीश हरे...
दीनबन्धु दुखहर्ता, ठाकुर तुम मेरे, स्वामी रक्षक तुम मेरे ।
अपने हाथ उठाओ, अपने शरण लगाओ, द्वार पड़ा तेरे ॥ ॐ जय जगदीश हरे...
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा, स्वामी पाप हरो देवा ।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा ॥ ॐ जय जगदीश हरे...
तन मन धन सब कुछ है तेरा, स्वामी सब कुछ है तेरा ।
तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा ॥ ॐ जय जगदीश हरे...
रचयिता: Pt. Shardha Ram Phillauri (1837–1881)
इस आरती में जगत के स्वामी हरि से प्रार्थना की गई है, जो भक्तों के संकट क्षण भर में दूर कर देते हैं। श्रीकृष्ण स्वयं हरि हैं, इसलिए कृष्ण-मंदिरों में भी यह आरती प्रेम से गाई जाती है।
भक्त कहता है — जो आपका ध्यान करता है, उसे फल मिलता है, मन का दुःख मिटता है और घर में सुख-संपत्ति आती है। आप ही मेरे माता-पिता हैं; आपके सिवा मैं किसकी शरण लूँ?
आप पूर्ण परमात्मा, अंतर्यामी और पारब्रह्म परमेश्वर हैं। आप करुणा के सागर और पालनकर्ता हैं। आप एक हैं, इंद्रियों से परे हैं और सबके प्राणों के स्वामी हैं; मैं अल्पबुद्धि आपसे कैसे मिलूँ?
हे दीनबंधु, दुःख हरने वाले, अपना हाथ बढ़ाइए; मैं आपके द्वार पर पड़ा हूँ। मेरे विषय-विकार मिटाइए, पाप हरिए, श्रद्धा-भक्ति और संतों की सेवा का भाव बढ़ाइए। अंत में भक्त कहता है — तन, मन, धन सब आपका ही है, आपको आपका ही अर्पण है।
- Author
- Pt. Shardha Ram Phillauri (1837–1881)
- Note
- Several stanzas have small regional variants; this is the most commonly sung form.