भगवद् गीता वर्ल्ड

मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो (सूरदास)

सूरदास (16वीं सदी) का प्रसिद्ध वात्सल्य पद — माखन चुराकर पकड़े गए नन्हे कान्हा की मीठी सफ़ाई।

मूल पाठ

मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो ।

भोर भयो गैयन के पाछे, मधुबन मोहिं पठायो ।
चार पहर बंसीबट भटक्यो, साँझ परे घर आयो ॥

मैं बालक बहियन को छोटो, छींको किहि बिधि पायो ।
ग्वाल बाल सब बैर परे हैं, बरबस मुख लपटायो ॥

तू जननी मन की अति भोरी, इनके कहे पतियायो ।
जिय तेरे कछु भेद उपजि है, जानि परायो जायो ॥

यह लै अपनी लकुटि कमरिया, बहुतहिं नाच नचायो ।
सूरदास तब बिहँसि जसोदा, लै उर कंठ लगायो ॥

रचयिता: Surdas (16th century)

सूरदास जी पुष्टिमार्ग के अष्टछाप कवियों में प्रमुख थे और श्रीनाथजी के सामने कीर्तन करते थे। उनका "सूरसागर" बाल-कृष्ण के वात्सल्य पदों का सागर है।

भावार्थ: माँ, मैंने माखन नहीं खाया! सुबह होते ही तुमने मुझे गायों के पीछे मधुबन भेज दिया; चार पहर बंसीवट पर भटकता रहा और साँझ होने पर घर आया।

मैं तो छोटा-सा बालक हूँ, मेरी बाँहें छोटी हैं — ऊँचे छींके तक मैं कैसे पहुँचता? सब ग्वाल-बाल मुझसे बैर रखते हैं, उन्होंने ज़बरदस्ती मेरे मुँह पर माखन लपेट दिया।

माँ, तुम मन की बहुत भोली हो, उनकी बातों पर विश्वास कर लिया। लगता है तुम्हारे मन में भेद आ गया है और तुम मुझे पराया जाया समझती हो। लो, यह अपनी लकुटी और कमली — तुमने मुझे बहुत नाच नचाया।

सूरदास कहते हैं — तब यशोदा माँ हँस पड़ीं और कान्हा को गले से लगा लिया।

Author
Surdas (16th century)
Note
Traditional text from the Sursagar tradition; small variants exist.

इसी श्रेणी में और – आरती, भजन और स्तुति