गीत गोविंद — दशावतार स्तोत्र (जयदेव)
कवि जयदेव (12वीं सदी) के गीत गोविंद का प्रथम अष्टपदी — "केशव धृत... जय जगदीश हरे", दस अवतारों की वंदना।
मूल पाठ
प्रलयपयोधिजले धृतवानसि वेदम् ।
विहितवहित्रचरित्रमखेदम् ॥
केशव धृतमीनशरीर जय जगदीश हरे ॥ १ ॥
क्षितिरतिविपुलतरे तव तिष्ठति पृष्ठे ।
धरणिधरणकिणचक्रगरिष्ठे ॥
केशव धृतकच्छपरूप जय जगदीश हरे ॥ २ ॥
वसति दशनशिखरे धरणी तव लग्ना ।
शशिनि कलङ्ककलेव निमग्ना ॥
केशव धृतसूकररूप जय जगदीश हरे ॥ ३ ॥
तव करकमलवरे नखमद्भुतशृङ्गम् ।
दलितहिरण्यकशिपुतनुभृङ्गम् ॥
केशव धृतनरहरिरूप जय जगदीश हरे ॥ ४ ॥
छलयसि विक्रमणे बलिमद्भुतवामन ।
पदनखनीरजनितजनपावन ॥
केशव धृतवामनरूप जय जगदीश हरे ॥ ५ ॥
क्षत्रियरुधिरमये जगदपगतपापम् ।
स्नपयसि पयसि शमितभवतापम् ॥
केशव धृतभृगुपतिरूप जय जगदीश हरे ॥ ६ ॥
वितरसि दिक्षु रणे दिक्पतिकमनीयम् ।
दशमुखमौलिबलिं रमणीयम् ॥
केशव धृतरामशरीर जय जगदीश हरे ॥ ७ ॥
वहसि वपुषि विशदे वसनं जलदाभम् ।
हलहतिभीतिमिलितयमुनाभम् ॥
केशव धृतहलधररूप जय जगदीश हरे ॥ ८ ॥
निन्दसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातम् ।
सदयहृदयदर्शितपशुघातम् ॥
केशव धृतबुद्धशरीर जय जगदीश हरे ॥ ९ ॥
म्लेच्छनिवहनिधने कलयसि करवालम् ।
धूमकेतुमिव किमपि करालम् ॥
केशव धृतकल्किशरीर जय जगदीश हरे ॥ १० ॥
श्रीजयदेवकवेरिदमुदितमुदारम् ।
शृणु सुखदं शुभदं भवसारम् ॥
केशव धृतदशविधरूप जय जगदीश हरे ॥ ११ ॥
रचयिता: Jayadeva (12th century), Gita Govinda, canto 1, ashtapadi 1
गीत गोविंद ओडिशा के कवि जयदेव की संस्कृत रचना है, जो आज भी पुरी के जगन्नाथ मंदिर की सेवा, ओडिसी नृत्य और भजन-परंपरा में गाई जाती है। इसके आरंभ में यह दशावतार स्तोत्र आता है, जिसमें हर अवतार को "केशव" का ही रूप कहा गया है।
भावार्थ (संक्षेप में): हे केशव! प्रलय के जल में मत्स्य बनकर आपने वेदों की रक्षा की; कच्छप बनकर पीठ पर पृथ्वी धारण की; वराह बनकर दाँत पर पृथ्वी उठाई; नरसिंह बनकर नखों से हिरण्यकशिपु को विदीर्ण किया; वामन बनकर बलि को छला और चरण-नख के जल (गंगा) से लोगों को पवित्र किया।
परशुराम बनकर संसार को पाप से मुक्त किया; राम बनकर रावण के दस सिर दिशाओं को भेंट किए; बलराम बनकर हल धारण किया; बुद्ध बनकर करुणा से पशु-हिंसा की निंदा की; और कल्कि बनकर कलियुग के अंत में दुष्टों के नाश के लिए तलवार उठाएँगे।
ध्यान दें कि जयदेव की इस सूची में बलराम और बुद्ध दोनों हैं और श्रीकृष्ण वे "केशव" हैं जो ये दसों रूप धारण करते हैं। अंतिम पद में जयदेव कहते हैं कि यह मंगल और सुख देने वाला गीत संसार का सार है।
- Author
- Jayadeva (12th century), Gita Govinda, canto 1, ashtapadi 1