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मधुराष्टकम्

श्री वल्लभाचार्य द्वारा रचित आठ श्लोकों का संस्कृत स्तोत्र — "मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्", मधुरता के स्वामी का सब कुछ मधुर है।

मूल पाठ

अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरम् ।
हृदयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ १ ॥

वचनं मधुरं चरितं मधुरं वसनं मधुरं वलितं मधुरम् ।
चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ २ ॥

वेणुर्मधुरो रेणुर्मधुरः पाणिर्मधुरः पादौ मधुरौ ।
नृत्यं मधुरं सख्यं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ ३ ॥

गीतं मधुरं पीतं मधुरं भुक्तं मधुरं सुप्तं मधुरम् ।
रूपं मधुरं तिलकं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ ४ ॥

करणं मधुरं तरणं मधुरं हरणं मधुरं रमणं मधुरम् ।
वमितं मधुरं शमितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ ५ ॥

गुञ्जा मधुरा माला मधुरा यमुना मधुरा वीची मधुरा ।
सलिलं मधुरं कमलं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ ६ ॥

गोपी मधुरा लीला मधुरा युक्तं मधुरं मुक्तं मधुरम् ।
दृष्टं मधुरं शिष्टं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ ७ ॥

गोपा मधुरा गावो मधुरा यष्टिर्मधुरा सृष्टिर्मधुरा ।
दलितं मधुरं फलितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ ८ ॥

॥ इति श्रीमद्वल्लभाचार्यविरचितं मधुराष्टकं सम्पूर्णम् ॥

रचयिता: Shri Vallabhacharya (15th–16th century)

पुष्टिमार्ग के प्रवर्तक श्री वल्लभाचार्य जी ने इस अष्टक में बालकृष्ण की मधुरता का गुणगान किया है। हर पंक्ति का अंत "मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्" से होता है — मधुरता के स्वामी का सब कुछ मधुर है।

पहले श्लोक में उनके होंठ, मुख, नेत्र, मुस्कान, हृदय और चाल को मधुर कहा गया है। दूसरे में उनके वचन, चरित्र, वस्त्र, अंग-भंगिमा, चलना और घूमना मधुर हैं। तीसरे में बाँसुरी, चरणों की धूल, हाथ, चरण, नृत्य और मित्रता मधुर हैं।

चौथे श्लोक में उनका गीत, पीना, खाना, सोना, रूप और तिलक मधुर है। पाँचवें में उनके कर्म, तैरना, (माखन) चुराना, क्रीड़ा, और यहाँ तक कि उनका शांत होना भी मधुर है।

छठे श्लोक में गुंजा की माला, यमुना, उसकी लहरें, जल और कमल मधुर हैं। सातवें में गोपियाँ, लीला, उनका मिलना और छूटना, देखना और शिष्टाचार मधुर है। आठवें में ग्वाल-बाल, गायें, उनकी छड़ी, उनकी रची सृष्टि, उनका दलन (दुष्टों का नाश) और फल देना भी मधुर है।

इसका भाव यह है कि भगवान से जुड़ी हर वस्तु प्रेमी भक्त को मधुर लगती है। इसे प्रतिदिन प्रातः या संध्या के समय गाया जाता है।

Author
Shri Vallabhacharya (15th–16th century)

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