गोविन्द दामोदर स्तोत्रम्
संत बिल्वमंगल (लीलाशुक) की प्रसिद्ध रचना, जिसका हर श्लोक "गोविन्द दामोदर माधवेति" पर समाप्त होता है।
मूल पाठ
श्रीकृष्ण विष्णो मधुकैटभारे भक्तानुकम्पिन् भगवन् मुरारे ।
त्रायस्व मां केशव लोकनाथ गोविन्द दामोदर माधवेति ॥
विक्रेतुकामा किल गोपकन्या मुरारिपादार्पितचित्तवृत्तिः ।
दध्यादिकं मोहवशादवोचद् गोविन्द दामोदर माधवेति ॥
अग्रे कुरूणामथ पाण्डवानां दुःशासनेनाहृतवस्त्रकेशा ।
कृष्णा तदाक्रोशदनन्यनाथा गोविन्द दामोदर माधवेति ॥
जिह्वे सदैवं भज सुन्दराणि नामानि कृष्णस्य मनोहराणि ।
समस्तभक्तार्तिविनाशनानि गोविन्द दामोदर माधवेति ॥
रचयिता: Attributed to Bilvamangala Thakur (Lilashuka)
यह लंबा स्तोत्र संत बिल्वमंगल ठाकुर की रचना माना जाता है। इसका संदेश है कि हर परिस्थिति में — सुख में, संकट में, काम करते हुए — जीभ पर "गोविन्द, दामोदर, माधव" नाम रहें। यहाँ चार प्रसिद्ध श्लोक दिए गए हैं।
पहला: हे श्रीकृष्ण, विष्णु, मधु-कैटभ के शत्रु, भक्तों पर दया करने वाले भगवान मुरारि, हे केशव, लोकनाथ — मेरी रक्षा करो। हे गोविन्द, दामोदर, माधव!
दूसरा: दही बेचने निकली एक गोपी का मन मुरारी के चरणों में ऐसा लगा था कि वह "दही लो" की जगह "गोविन्द, दामोदर, माधव" पुकारने लगी।
तीसरा: कौरवों और पांडवों के सामने जब दुःशासन ने द्रौपदी के वस्त्र और केश खींचे, तब किसी और सहारे के बिना द्रौपदी (कृष्णा) ने पुकारा — "गोविन्द, दामोदर, माधव!"
चौथा: हे जिह्वा, सदा श्रीकृष्ण के इन सुंदर और मनोहर नामों का भजन करो, जो सब भक्तों के कष्ट मिटाते हैं — गोविन्द, दामोदर, माधव।
- Author
- Attributed to Bilvamangala Thakur (Lilashuka)
- Note
- Four selected verses of a long hymn; verse order differs between editions.