भगवद् गीता वर्ल्ड

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो (मीराबाई)

मीराबाई (16वीं सदी) का प्रसिद्ध पद — सद्गुरु की कृपा से मिला हरिनाम ही सबसे अनमोल धन है।

मूल पाठ

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ।

वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु, किरपा कर अपनायो ॥ पायो जी...

जनम जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो ॥ पायो जी...

खरच न खूटे, चोर न लूटे, दिन दिन बढ़त सवायो ॥ पायो जी...

सत की नाव खेवटिया सतगुरु, भवसागर तर आयो ॥ पायो जी...

मीरा के प्रभु गिरिधर नागर, हरख हरख जस गायो ॥ पायो जी...

रचयिता: Mirabai (16th century)

मीराबाई गिरिधर गोपाल की अनन्य भक्त थीं। इस पद में "राम" का अर्थ हरि का नाम है, जो सबमें रमण करता है।

भावार्थ: मुझे राम-रत्न रूपी धन मिल गया। मेरे सद्गुरु ने कृपा करके यह अनमोल वस्तु दी और मुझे अपना लिया। जन्म-जन्म की पूँजी मुझे मिल गई और संसार का सब मोह छूट गया।

यह ऐसा धन है जो खर्च करने से घटता नहीं, जिसे चोर लूट नहीं सकता, और जो दिन-दिन सवाया बढ़ता है। सत्य की नाव है और सद्गुरु उसके खेवनहार हैं — उनके सहारे मैं भवसागर पार कर आई।

मीरा कहती हैं — मेरे प्रभु चतुर गिरिधर हैं; मैं प्रसन्न होकर बार-बार उनका यश गाती हूँ।

Author
Mirabai (16th century)
Note
Traditional text; small wording variations exist between collections.

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