मेरे तो गिरिधर गोपाल, दूसरो न कोई (मीराबाई)
मीराबाई का अमर पद — "मेरे तो केवल गिरिधर गोपाल हैं, दूसरा कोई नहीं।" अनन्य भक्ति का सबसे सुंदर उदाहरण।
मूल पाठ
मेरे तो गिरिधर गोपाल, दूसरो न कोई ।
जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई ॥
तात मात भ्रात बंधु, आपनो न कोई ।
छाँड़ि दई कुल की कानि, कहा करिहै कोई ॥
संतन ढिग बैठि बैठि, लोक लाज खोई ।
अँसुवन जल सींचि सींचि, प्रेम बेलि बोई ॥
अब तो बेलि फैल गई, आणँद फल होई ।
दूध की मथनियाँ बड़े प्रेम से बिलोई ॥
माखन जब काढ़ि लियो, छाछ पिये कोई ।
भगत देखि राजी हुई, जगत देखि रोई ॥
दासी मीरा लाल गिरिधर, तारो अब मोही ॥
रचयिता: Mirabai (16th century)
भावार्थ: मेरे तो केवल गिरिधर गोपाल हैं, दूसरा कोई नहीं। जिनके सिर पर मोर-मुकुट है, वही मेरे स्वामी हैं। पिता, माता, भाई, बंधु — कोई भी अपना नहीं।
मैंने कुल की मर्यादा की चिंता छोड़ दी; अब कोई क्या कर लेगा? संतों के पास बैठ-बैठकर मैंने लोक-लाज खो दी। आँसुओं के जल से सींच-सींचकर मैंने प्रेम की बेल बोई है; अब वह बेल फैल गई है और उस पर आनंद के फल लगते हैं।
जैसे दूध को मथकर मक्खन निकाल लिया जाता है और छाछ कोई और पी लेता है, वैसे ही मैंने संसार में से भक्ति का सार ले लिया। भक्तों को देखकर मैं प्रसन्न होती हूँ और संसार की दशा देखकर रोती हूँ।
दासी मीरा कहती हैं — हे लाल गिरिधर, अब मुझे भवसागर से तार दो।
यह पद गीता (अध्याय 9, श्लोक 22) के "अनन्य भक्ति" भाव का जीवंत रूप है।
- Author
- Mirabai (16th century)
- Note
- Traditional text; collections differ slightly in wording and in the order of lines.