जयदेव कृत गीतगोविंद
बारहवीं शताब्दी में कवि जयदेव द्वारा रचित संस्कृत काव्य गीतगोविंद, जो श्री जगन्नाथ मंदिर की परंपरा, भक्ति संगीत और शास्त्रीय नृत्य का अभिन्न अंग है।
गीतगोविंद संस्कृत का एक अत्यंत मधुर गेय काव्य है, जिसकी रचना बारहवीं शताब्दी में भक्त कवि जयदेव ने की। लोकप्रिय परंपरा के अनुसार जयदेव ओडिशा में पुरी के निकट केंदुली गाँव के निवासी थे, जबकि एक अन्य परंपरा उन्हें बंगाल के केंदुली से जोड़ती है। उनकी पत्नी पद्मावती श्री जगन्नाथ की सेवा में समर्पित नृत्यांगना मानी जाती हैं।
यह काव्य बारह सर्गों में है और इसमें चौबीस गीत हैं, जिन्हें "अष्टपदी" कहा जाता है, क्योंकि प्रायः प्रत्येक गीत में आठ पद होते हैं। हर गीत के लिए राग और ताल का निर्देश दिया गया है, इसलिए यह आरंभ से ही गाने के लिए रचा गया ग्रंथ है। इसका विषय श्री राधा और श्रीकृष्ण का दिव्य प्रेम है, जिसे भक्त जीवात्मा और परमात्मा के मिलन की लालसा का प्रतीक मानते हैं।
पहले सर्ग में प्रसिद्ध "दशावतार स्तोत्र" आता है, जिसमें मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, बलराम, बुद्ध और कल्कि, इन दस अवतारों का वंदन है, और प्रत्येक पद "जय जगदीश हरे" से समाप्त होता है। यहाँ सभी अवतारों को श्रीकृष्ण के ही रूप माना गया है।
पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर में सदियों से गीतगोविंद का गायन सेवा का अंग रहा है, और ओडिसी नृत्य की परंपरा में इसका विशेष स्थान है। भरतनाट्यम, कथकली तथा कर्नाटक और हिंदुस्तानी संगीत में भी अष्टपदियाँ गाई और प्रस्तुत की जाती हैं। चैतन्य महाप्रभु सहित अनेक संतों ने इसे बड़े प्रेम से आस्वादित किया। आज भी यह भक्ति, संगीत और कला का एक अनमोल संगम है।
- Source
- Jayadeva, Gita Govinda
- Cantos
- 12
- Ashtapadis
- 24