श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 9, श्लोक 26
अध्याय 9 – राजविद्याराजगुह्ययोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
patraṃ puṣpaṃ phalaṃ toyaṃ yo me bhaktyā prayacchati .
tadahaṃ bhaktyupahṛtamaśnāmi prayatātmanaḥ ॥
अर्थ
जो कोई भक्त मुझे प्रेम से पत्र, पुष्प, फल या जल अर्पित करता है, उस शुद्ध हृदय वाले भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पित किया हुआ वह (उपहार) मैं स्वीकार करता हूँ — प्रेम से उसे ग्रहण करता हूँ
शब्दार्थ
- पत्रम् – पत्ता
- पुष्पम् – फूल
- फलम् – फल
- तोयम् – जल
- यः – जो
- मे – मुझे
- भक्त्या – भक्ति (प्रेम) से
- प्रयच्छति – अर्पित करता है
- तत् – वह
- अहम् – मैं
- भक्त्युपहृतम् – भक्तिपूर्वक लाया (अर्पित किया) हुआ
- अश्नामि – खाता हूँ, स्वीकार करता हूँ
- प्रयतात्मनः – शुद्ध मन वाले (भक्त) का
अन्वय
यः भक्त्या मे पत्रं पुष्पं फलं तोयं प्रयच्छति, प्रयतात्मनः (तस्य) भक्त्युपहृतं तत् अहम् अश्नामि ।
व्याख्या
यह श्लोक भक्ति की सरलता और भगवान् के वात्सल्य का सबसे सुंदर चित्र है। दूसरे श्लोक में भगवान् ने कहा था कि यह राजविद्या ‘करने में अत्यंत सुगम’ है। यहाँ वे उसका प्रमाण देते हैं। जहाँ स्वर्ग पाने के लिए बड़े-बड़े यज्ञ, बहुत धन और जटिल विधियाँ चाहिए, वहाँ स्वयं भगवान् को पाने के लिए केवल एक पत्ता, एक फूल, एक फल या थोड़ा-सा जल पर्याप्त है।
परंतु ध्यान दें — चारों वस्तुएँ विकल्प हैं, अनिवार्य नहीं। आचार्यों ने इस क्रम में सुंदर भाव देखा है: जो पत्ता दे सकता है वह पत्ता दे, जिसे फूल मिल जाए वह फूल, जिसके पास फल हो वह फल, और जिसके पास कुछ भी नहीं, वह केवल जल अर्पित करे। जल तो हर किसी को सुलभ है। इसका अर्थ है कि भगवान् की पूजा से कोई भी — गरीब हो या अमीर, विद्वान् हो या अनपढ़ — वंचित नहीं है।
इस श्लोक की कुंजी दो शब्दों में है — ‘भक्त्या’ और ‘प्रयतात्मनः’। ‘भक्त्या’ शब्द श्लोक में दो बार आता है — ‘भक्त्या प्रयच्छति’ और ‘भक्त्युपहृतम्’। भगवान् वस्तु नहीं, उसके पीछे का प्रेम देखते हैं। ‘प्रयतात्मनः’ — शुद्ध हृदय वाले का। आचार्य शंकर कहते हैं कि भगवान् शुद्ध-चित्त भक्त की भेंट ही स्वीकार करते हैं। आचार्य रामानुज कहते हैं कि भक्त का प्रेम ही वह वस्तु है जो भगवान् को सबसे अधिक प्रिय है; भक्त भगवान् को प्रसन्न करने के लिए ही भेंट देता है, बदले में कुछ पाने के लिए नहीं।
‘अश्नामि’ — ‘मैं खाता हूँ’। पूर्णकाम भगवान्, जिन्हें किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं, कहते हैं कि मैं भक्त की भेंट खाता हूँ! यह उनके प्रेम की पराकाष्ठा है। भागवत में विदुरानी की कथा प्रसिद्ध है, जिन्होंने प्रेम में विह्वल होकर श्रीकृष्ण को केले का गूदा फेंककर छिलके खिला दिए, और भगवान् ने उन्हें भी बड़े प्रेम से खाया। शबरी के जूठे बेर, सुदामा के तंदुल — ये सब इसी श्लोक के जीवंत उदाहरण हैं। दुर्योधन के छप्पन भोग भगवान् ने ठुकरा दिए, पर विदुर के घर का साग प्रेम से खाया।
इस प्रकार यह श्लोक बताता है कि भगवान् और भक्त का संबंध लेन-देन का नहीं, प्रेम का है। भगवान् को कीमती वस्तुओं की नहीं, सच्चे हृदय की भूख है।
प्रसंग
पच्चीसवें श्लोक में कहा गया कि भगवान् की उपासना करने वाले भगवान् को ही प्राप्त होते हैं। यहाँ भगवान् बताते हैं कि यह उपासना कितनी सरल है। अगले श्लोक में वे इसे और विस्तृत करते हुए कहेंगे कि जीवन का हर कर्म — खाना, देना, तप करना — उन्हें अर्पित किया जा सकता है।
जीवन-शिक्षा
भगवान् को प्रसन्न करने के लिए धन या आडंबर नहीं, सच्चा प्रेम चाहिए। जो कुछ भी आपके पास है — एक फूल, एक गिलास जल, या एक प्रार्थना — उसे प्रेम से अर्पित करें। भेंट की कीमत नहीं, भावना की गहराई महत्त्वपूर्ण है।
मुख्य शब्द
- पत्र-पुष्प-फल-तोय
- पत्ता, फूल, फल, जल — सबसे सरल भेंटें
- भक्त्युपहृत
- प्रेमपूर्वक अर्पित किया हुआ
- प्रयतात्मा
- शुद्ध और संयत हृदय वाला
- अश्नामि
- खाता हूँ — प्रेम से स्वीकार करता हूँ
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 9.21 – ते तं भुक्त्वा
- गीता 9.22 – अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये
- गीता 9.23 – येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते
- गीता 9.24 – अहं हि सर्वयज्ञानां
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- गीता 9.27 – यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि
- गीता 9.28 – शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः
- गीता 9.29 – समोऽहं सर्वभूतेषु न
- गीता 9.30 – अपि चेत्सुदुराचारो भजते
- गीता 9.31 – क्षिप्रं भवति धर्मात्मा