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श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 8, श्लोक 1

अध्याय 8 – अक्षरब्रह्मयोग · वक्ता: अर्जुन

संस्कृत श्लोक

अर्जुन उवाच ।
किं तद् ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम ।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

arjuna uvāca .
kiṃ tad brahma kimadhyātmaṃ kiṃ karma puruṣottama .
adhibhūtaṃ ca kiṃ proktamadhidaivaṃ kimucyate ॥

अर्थ

अर्जुन ने कहा — हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत किसे कहा गया है और अधिदैव किसे कहा जाता है?

शब्दार्थ

  • किम् – क्या है
  • तत् – वह
  • ब्रह्म – ब्रह्म
  • अध्यात्मम् – अध्यात्म
  • कर्म – कर्म
  • पुरुषोत्तम – हे पुरुषोत्तम
  • अधिभूतम् – अधिभूत
  • च – और
  • प्रोक्तम् – कहा गया है
  • अधिदैवम् – अधिदैव
  • उच्यते – कहा जाता है

अन्वय

अर्जुनः उवाच — पुरुषोत्तम, तत् ब्रह्म किम्? अध्यात्मं किम्? कर्म किम्? अधिभूतं च किं प्रोक्तम्? अधिदैवं किम् उच्यते?

व्याख्या

सातवें अध्याय के अंत में भगवान् ने ऐसे कई शब्द कहे थे जो अर्जुन के लिए नए थे — ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ (7.29–30)। जिज्ञासु शिष्य की यही पहचान है कि वह सुनी हुई बात को आगे बढ़ने से पहले स्पष्ट कर लेता है। इसलिए आठवाँ अध्याय अर्जुन के प्रश्नों से खुलता है।

अर्जुन यहाँ सात प्रश्न पूछता है, जिनमें से पाँच इस श्लोक में हैं। ‘वह ब्रह्म क्या है?’ — जिसे जानकर जीव संसार से पार होता है। ‘अध्यात्म क्या है?’ — जीव के भीतर का वह तत्त्व जिस पर सब कुछ टिका है। ‘कर्म क्या है?’ — वह क्रिया जिससे जन्म-मरण का चक्र चलता है। ‘अधिभूत’ और ‘अधिदैव’ — सृष्टि के भौतिक और दैवी पक्ष। अर्जुन ‘पुरुषोत्तम’ कहकर संबोधित करता है, क्योंकि वह जानता है कि जिससे वह पूछ रहा है, वही इन सबका परम आधार है।

इन प्रश्नों के पीछे एक गहरी चिंता भी है। अर्जुन युद्ध के मुहाने पर खड़ा है, जहाँ मृत्यु निकट है। इसलिए वह जानना चाहता है कि जीवन की इस सारी रचना का सार क्या है और अन्तिम क्षण में क्या करना चाहिए। अगला श्लोक उसी प्रश्न को पूरा करता है।

शंकराचार्य कहते हैं कि ये प्रश्न इसलिए पूछे गए कि भगवान् ने इन शब्दों को बिना परिभाषा के कहा था; अब उत्तर में प्रत्येक शब्द का निश्चित अर्थ सामने आएगा।

प्रसंग

सातवें अध्याय के अंतिम दो श्लोकों (7.29–30) में भगवान् ने ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ का नाम लिया था। अर्जुन उन्हीं का अर्थ पूछता है। उत्तर 8.3–4 में मिलेगा।

जीवन-शिक्षा

जो बात समझ में न आए, उसे विनम्रता से पूछ लेना ज्ञान की ओर पहला कदम है। अधूरी समझ पर चलना जीवन में भी भ्रम पैदा करता है; स्पष्टता के लिए प्रश्न पूछना कमजोरी नहीं, श्रद्धा और गंभीरता का लक्षण है।

मुख्य शब्द

ब्रह्म
परम, सर्वव्यापी, अविनाशी तत्त्व
अध्यात्म
जीव का भीतरी स्वरूप, आत्मा से जुड़ा विषय
अधिभूत
नाशवान भौतिक जगत् से जुड़ा पक्ष
अधिदैव
देवताओं और सृष्टि-शक्तियों से जुड़ा पक्ष

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