श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 8, श्लोक 4
अध्याय 8 – अक्षरब्रह्मयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
adhibhūtaṃ kṣaro bhāvaḥ puruṣaścādhidaivatam .
adhiyajño.ahamevātra dehe dehabhṛtāṃ vara ॥
अर्थ
हे देहधारियों में श्रेष्ठ! नाशवान पदार्थ अधिभूत है, पुरुष अधिदैव है, और इस शरीर में मैं स्वयं ही अधियज्ञ हूँ
शब्दार्थ
- अधिभूतम् – अधिभूत
- क्षरः – नाशवान
- भावः – पदार्थ, भाव, अस्तित्व
- पुरुषः – पुरुष, हिरण्यगर्भ/विराट् पुरुष
- च – और
- अधिदैवतम् – अधिदैव
- अधियज्ञः – अधियज्ञ
- अहम् एव – मैं ही
- अत्र देहे – यहाँ इस शरीर में
- देहभृतां वर – हे देहधारियों में श्रेष्ठ
अन्वय
देहभृतां वर, क्षरः भावः अधिभूतम्; पुरुषः च अधिदैवतम्; अत्र देहे अहम् एव अधियज्ञः ।
व्याख्या
इस श्लोक में शेष तीन शब्दों की परिभाषा दी गई है। ‘अधिभूत’ वह है जो ‘क्षर’ अर्थात् नाशवान भाव है — जन्मने, बदलने और मिटने वाला सारा भौतिक जगत्। शरीर, पदार्थ और पंचमहाभूतों से बना सब कुछ अधिभूत के अन्तर्गत है। प्राणियों के संदर्भ में इसका अर्थ यह है कि जिन पर कर्म का फल प्रकट होता है, वे सब बदलने वाली वस्तुएँ।
‘अधिदैव’ को यहाँ ‘पुरुष’ कहा गया है। शंकराचार्य के अनुसार यह आदिपुरुष हिरण्यगर्भ है, जो सब इन्द्रियों के अधिष्ठाता देवताओं का समष्टि-रूप है; दूसरे शब्दों में, चेतन शक्तियाँ जो सृष्टि को और हमारी इन्द्रियों को संचालित करती हैं। रामानुज यहाँ पुरुष को ब्रह्मा आदि देवों के अधिपति के रूप में देखते हैं। दोनों ही भौतिक पदार्थ से ऊपर के उस दैवी स्तर की बात करते हैं जो जगत् का प्रबन्ध करता है।
सबसे महत्त्वपूर्ण वाक्य अन्त में है — ‘अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे’, यज्ञ का अधिष्ठाता मैं ही हूँ, इसी शरीर में। यह उत्तर अर्जुन के उस प्रश्न का है कि वह देह में कैसे है। भगवान् ही अन्तर्यामी साक्षी के रूप में हर कर्म और उपासना को स्वीकार करते हैं और फल देते हैं। अर्थात् जो कुछ शरीर में हो रहा है, उसका अन्तिम साक्षी और स्वामी वही हैं।
सम्बोधन ‘देहभृतां वर’ भी सार्थक है: देहधारी होते हुए भी तुम उस अन्तर्यामी को जान सकते हो, इसी कारण तुम श्रेष्ठ हो।
प्रसंग
8.3 में ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म परिभाषित हुए थे। इस श्लोक में अर्जुन के शेष तीन प्रश्नों — अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ — का उत्तर पूरा होता है। अगले श्लोक से मृत्यु-समय के स्मरण का प्रश्न उठाया जाता है।
जीवन-शिक्षा
नाशवान वस्तुओं में उलझना व्यर्थ है, क्योंकि वे बदलती हैं। अपने हर कर्म का साक्षी और स्वामी भीतर बैठा परमात्मा है, यह भाव रखने से जीवन में सजगता और शुद्धता आती है।
मुख्य शब्द
- अधिभूत
- नाशवान पंचभूत-जगत्, सब परिवर्तनशील पदार्थ
- अधिदैव
- आदि पुरुष/हिरण्यगर्भ; इन्द्रियों के अधिष्ठाता देवता
- अधियज्ञ
- यज्ञ का स्वामी — स्वयं भगवान्, जो देह में अन्तर्यामी हैं
- देहभृतां वर
- देहधारियों में श्रेष्ठ — अर्जुन
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 8.1 – अर्जुन उवाच
- गीता 8.2 – अधियज्ञः कथं कोऽत्र
- गीता 8.3 – श्रीभगवानुवाच
- गीता 8.5 – अन्तकाले च मामेव
- गीता 8.6 – यं यं वापि
- गीता 8.7 – तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर
- गीता 8.8 – अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना
- गीता 8.9 – कविं पुराणमनुशासितार-
- गीता 8.10 – प्रयाणकाले मनसाऽचलेन
- गीता 8.11 – यदक्षरं वेदविदो वदन्ति