श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 8, श्लोक 2
अध्याय 8 – अक्षरब्रह्मयोग · वक्ता: अर्जुन
संस्कृत श्लोक
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन ।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
adhiyajñaḥ kathaṃ ko.atra dehe.asminmadhusūdana .
prayāṇakāle ca kathaṃ jñeyo.asi niyatātmabhiḥ ॥
अर्थ
हे मधुसूदन! यहाँ इस शरीर में अधियज्ञ कौन है और वह कैसे है? और अन्त समय में संयमी चित्त वाले लोग आपको कैसे जान पाते हैं?
शब्दार्थ
- अधियज्ञः – अधियज्ञ
- कथम् – कैसे
- कः – कौन
- अत्र – यहाँ
- देहे अस्मिन् – इस शरीर में
- मधुसूदन – हे मधुसूदन (मधु दैत्य के संहारक)
- प्रयाणकाले – प्रयाण (मृत्यु) के समय
- च – और
- ज्ञेयः असि – जानने योग्य हैं, जाने जाते हैं
- नियतात्मभिः – संयमी चित्त वालों द्वारा
अन्वय
मधुसूदन, अत्र अस्मिन् देहे अधियज्ञः कः, कथं (च)? प्रयाणकाले च नियतात्मभिः कथं ज्ञेयः असि?
व्याख्या
अर्जुन के सात प्रश्नों में से पहले पाँच पिछले श्लोक में थे; यहाँ शेष दो हैं। पहला — अधियज्ञ कौन है, और ‘इस देह में’ कैसे स्थित है? दूसरा — और अधिक व्यावहारिक — मृत्यु के क्षण में संयमी साधक आपको कैसे स्मरण करते और जानते हैं?
‘अधियज्ञ’ शब्द यज्ञ के अधिष्ठाता को सूचित करता है — वह जो यज्ञ का फल देता है। अर्जुन पूछता है कि वह इस देह में कैसे है; क्या वह कोई बाहरी देवता है या देह के भीतर ही स्थित कोई सत्ता? यह प्रश्न इस भाव से जुड़ा है कि हमारा हर कर्म एक प्रकार का यज्ञ है, तो उसका स्वामी कौन है।
दूसरा प्रश्न पूरे अध्याय का केन्द्र बन जाता है। ‘प्रयाणकाले’ — प्रयाण अर्थात् शरीर से प्रस्थान का समय। जीवन भर की साधना की असली परीक्षा उसी क्षण होती है, जब शरीर, इन्द्रियाँ और मन सब शिथिल हो रहे होते हैं। ‘नियतात्मभिः’ से संकेत है कि वही इस क्षण में भगवान् को जान सकते हैं जिन्होंने पहले से मन को साधा हो। रामानुज इसे इस रूप में समझते हैं कि अन्त समय में भगवान् का ध्यान किस विधि से सम्भव है।
भगवान् अगले श्लोकों में सबसे पहले परिभाषाएँ देंगे (8.3–4), और फिर इस दूसरे प्रश्न का उत्तर विस्तार से (8.5 से आगे)।
प्रसंग
यह अर्जुन के प्रश्नों का उत्तरार्ध है। पिछले श्लोक में पाँच शब्दों के अर्थ पूछे गए थे; यहाँ अधियज्ञ और मृत्यु-समय के स्मरण का प्रश्न है, जिसका उत्तर आगे अध्याय का मुख्य विषय बनता है।
जीवन-शिक्षा
जीवन की साधना का महत्व इस बात से है कि अन्त समय में हमारा मन कहाँ टिकता है। इसलिए आज से ही मन को संयम और स्मरण का अभ्यास कराना चाहिए, ताकि निर्णायक क्षण में वह साथ दे।
मुख्य शब्द
- अधियज्ञ
- यज्ञ का अधिष्ठाता, यज्ञ-फल का स्वामी
- प्रयाणकाल
- देह छोड़ने का अन्तिम समय
- नियतात्मा
- जिसने मन और इन्द्रियों को वश में किया है
- मधुसूदन
- श्रीकृष्ण का नाम; मधु दैत्य को मारने वाले
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 8.1 – अर्जुन उवाच
- गीता 8.3 – श्रीभगवानुवाच
- गीता 8.4 – अधिभूतं क्षरो भावः
- गीता 8.5 – अन्तकाले च मामेव
- गीता 8.6 – यं यं वापि
- गीता 8.7 – तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर
- गीता 8.8 – अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना
- गीता 8.9 – कविं पुराणमनुशासितार-
- गीता 8.10 – प्रयाणकाले मनसाऽचलेन
- गीता 8.11 – यदक्षरं वेदविदो वदन्ति