श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 7, श्लोक 30
अध्याय 7 – ज्ञानविज्ञानयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
sādhibhūtādhidaivaṃ māṃ sādhiyajñaṃ ca ye viduḥ .
prayāṇakāle.api ca māṃ te viduryuktacetasaḥ ॥
अर्थ
जो लोग मुझे अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ के सहित जानते हैं, वे युक्तचित्त पुरुष मृत्यु के समय भी मुझे ही जानते (स्मरण करते) हैं
शब्दार्थ
- साधिभूताधिदैवम् – अधिभूत और अधिदैव के सहित
- माम् – मुझको
- साधियज्ञम् – अधियज्ञ के सहित
- च – और
- ये – जो
- विदुः – जानते हैं
- प्रयाणकाले – प्रयाण (मृत्यु) के समय
- अपि – भी
- ते – वे
- युक्तचेतसः – युक्त (स्थिर) चित्त वाले
अन्वय
ये साधिभूताधिदैवं साधियज्ञं च मां विदुः, ते युक्तचेतसः प्रयाणकाले अपि च मां विदुः ।
व्याख्या
सातवें अध्याय का यह अंतिम श्लोक भगवान् के ‘समग्र’ स्वरूप के ज्ञान को पूरा करता है और एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय — मृत्यु के समय की स्मृति — की ओर संकेत करके आठवें अध्याय का द्वार खोलता है।
भगवान् तीन और शब्द जोड़ते हैं। ‘अधिभूत’ — भौतिक जगत् से सम्बन्धित तत्त्व; ‘अधिदैव’ — देवताओं और सृष्टि की दैवी शक्तियों से सम्बन्धित तत्त्व; ‘अधियज्ञ’ — यज्ञ से सम्बन्धित तत्त्व, अर्थात् सब यज्ञों और कर्मों के भोक्ता। पिछले श्लोक के ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म के साथ ये छह शब्द मिलकर बताते हैं कि भगवान् ही भौतिक जगत्, देवशक्तियाँ, जीव, कर्म और परम सत्य — सबमें व्याप्त और सबके आधार हैं। इनकी विस्तृत व्याख्या भगवान् 8.3–4 में करेंगे।
जो इस समग्र रूप में भगवान् को जानते हैं, उनके लिए एक महान फल है — ‘प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः’ — वे मृत्यु के समय भी मुझे जानते हैं। मृत्यु का क्षण अत्यंत कठिन होता है; शरीर पीड़ा में होता है, इन्द्रियाँ शिथिल हो जाती हैं, मन भय और मोह से भर सकता है। उस समय भगवान् को स्मरण रखना साधारण बात नहीं। पर जिसने जीवनभर भगवान् को सबमें देखा, उसकी ‘युक्तचेतस्’ — स्थिर चेतना — अंत समय में भी उन्हें नहीं भूलती।
आचार्य शंकर कहते हैं कि जिनका चित्त मुझमें समाहित है, वे मरण-काल में भी मुझे जानते हैं। यह श्लोक बताता है कि मृत्यु के समय की स्मृति अचानक नहीं आती; वह जीवनभर के अभ्यास का फल है। यही विषय आठवें अध्याय का केंद्र बनेगा, जहाँ भगवान् कहेंगे — अंत समय में जो जिसका स्मरण करता है, वह उसी को प्राप्त होता है (8.5–6)।
प्रसंग
7.29 में ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म को जानने वाले भक्तों का वर्णन था। यह श्लोक अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ जोड़कर अध्याय समाप्त करता है। आठवें अध्याय के आरम्भ (8.1–2) में अर्जुन इन्हीं सात विषयों — ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ और प्रयाणकाल में ज्ञान — के बारे में प्रश्न करता है।
जीवन-शिक्षा
जीवन के अंतिम क्षण की तैयारी जीवनभर होती है। जिस बात का हम प्रतिदिन अभ्यास करते हैं, वही संकट और अंत समय में मन में उभरती है। इसलिए आज से ही प्रतिदिन कुछ समय ईश्वर-स्मरण को दें।
मुख्य शब्द
- अधिभूत
- भौतिक, नश्वर जगत् से सम्बन्धित तत्त्व
- अधिदैव
- देवताओं और दैवी शक्तियों से सम्बन्धित तत्त्व
- अधियज्ञ
- सब यज्ञों के अधिष्ठाता और भोक्ता
- प्रयाणकाल
- मृत्यु का समय, शरीर छोड़ने का क्षण
- युक्तचेतस्
- जिसका चित्त भगवान् में स्थिर है