श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 17, श्लोक 15
अध्याय 17 – श्रद्धात्रयविभागयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
anudvegakaraṃ vākyaṃ satyaṃ priyahitaṃ ca yat .
svādhyāyābhyasanaṃ caiva vāṅmayaṃ tapa ucyate ॥
अर्थ
जो वचन किसी को उद्वेग (व्याकुलता) न पहुँचाने वाला, सत्य, प्रिय और हितकारी हो, तथा स्वाध्याय (शास्त्र-पाठ और नाम-जप) का अभ्यास — यह वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है
शब्दार्थ
- अनुद्वेगकरम् – उद्वेग, व्याकुलता न पैदा करने वाला
- वाक्यम् – वचन, वाणी
- सत्यम् – सत्य
- प्रियहितम् – प्रिय और हितकारी
- च – और
- यत् – जो
- स्वाध्यायाभ्यसनम् – स्वाध्याय का अभ्यास
- च एव – और भी
- वाङ्मयम् – वाणी-सम्बन्धी
- तपः – तप
- उच्यते – कहा जाता है
अन्वय
यत् वाक्यम् अनुद्वेगकरं सत्यं प्रियहितं च, स्वाध्यायाभ्यसनं च एव — (तत्) वाङ्मयं तपः उच्यते ।
व्याख्या
शरीर के बाद भगवान् वाणी के तप का वर्णन करते हैं। वाणी मनुष्य की सबसे शक्तिशाली क्षमता है — एक शब्द किसी का दिन बना सकता है या जीवन भर का घाव दे सकता है। इसलिए वाणी का संयम एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तप है। इस श्लोक में वाणी की चार कसौटियाँ और एक अभ्यास बताया गया है।
पहली कसौटी — ‘अनुद्वेगकरम्’ — वह वाणी किसी के मन में उद्वेग, भय, क्रोध या व्याकुलता उत्पन्न न करे। दूसरी — ‘सत्यम्’ — वह सत्य हो; जैसा देखा, सुना और जाना है, वैसा ही कहा जाए। तीसरी — ‘प्रियम्’ — वह सुनने में मधुर और प्रिय हो। चौथी — ‘हितम्’ — वह सुनने वाले के लिए कल्याणकारी हो।
आचार्य शंकर एक महत्त्वपूर्ण बात कहते हैं — ये सब लक्षण एक साथ होने चाहिए। यदि कोई वचन सत्य है पर कठोर और उद्वेगकारी है, तो वह वाणी का तप नहीं। यदि प्रिय है पर असत्य है, तो भी तप नहीं। यह मनुस्मृति के प्रसिद्ध नियम से मेल खाता है: ‘सत्य बोलो, प्रिय बोलो; अप्रिय सत्य मत बोलो, और प्रिय असत्य भी मत बोलो।’ इसका अर्थ यह नहीं कि कठिन सत्य कभी न कहा जाए; बल्कि यह कि सत्य को भी करुणा, उचित समय और हित की दृष्टि से कहा जाए, जैसे एक अच्छा चिकित्सक कड़वी दवा को भी प्रेम से देता है।
अन्त में अभ्यास — ‘स्वाध्यायाभ्यसनं चैव’ — स्वाध्याय का नियमित अभ्यास। इसका अर्थ है वेद, गीता आदि शास्त्रों का पाठ, भगवान् के नाम का जप, और स्तोत्रों का गान। जब वाणी नियमित रूप से पवित्र शब्दों का उच्चारण करती है, तो वह स्वाभाविक रूप से शुद्ध होने लगती है। व्यर्थ की बातों, निन्दा और गपशप से बचाकर वाणी को सत्कर्मों में लगाना ही इसका सार है।
आज के युग में, जब हम केवल बोलते ही नहीं, बल्कि लिखते, संदेश भेजते और सोशल मीडिया पर टिप्पणी भी करते हैं, यह श्लोक और भी प्रासंगिक हो जाता है। हर शब्द से पहले ये चार प्रश्न — क्या यह सत्य है? क्या यह किसी को आहत करेगा? क्या यह प्रिय है? क्या यह हितकारी है? — वाणी के तप की व्यावहारिक कसौटी हैं।
प्रसंग
पिछले श्लोक में शारीरिक तप बताया गया; यहाँ वाणी का तप। अगले श्लोक में मानसिक तप का वर्णन है, जो तीनों में सबसे सूक्ष्म है।
जीवन-शिक्षा
बोलने या लिखने से पहले चार प्रश्न पूछें — क्या यह सत्य है, क्या यह किसी को व्याकुल तो नहीं करेगा, क्या यह प्रिय है, और क्या यह हितकारी है? यही वाणी का सबसे सरल और सबसे बड़ा तप है।
मुख्य शब्द
- वाङ्मय तप
- वाणी का तप — सत्य, प्रिय, हितकारी और अनुद्वेगकर वचन
- अनुद्वेगकर
- जो किसी के मन में व्याकुलता या भय उत्पन्न न करे
- स्वाध्याय
- शास्त्र-पाठ, नाम-जप और आत्म-अध्ययन
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 17.10 – यातयामं गतरसं पूति
- गीता 17.11 – अफलाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य
- गीता 17.12 – अभिसन्धाय तु फलं
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