भगवद् गीता वर्ल्ड

उद्धव गीता

श्रीमद्भागवत के एकादश स्कंध में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अपने प्रिय सखा उद्धवजी को दिया गया अंतिम उपदेश।

जब यदुवंश के उपसंहार और भगवान श्रीकृष्ण के स्वधाम गमन का समय निकट आया, तब उनके परम भक्त और सखा उद्धवजी अत्यंत व्याकुल हो गए। उन्होंने प्रार्थना की कि प्रभु उन्हें भी साथ ले चलें। तब भगवान ने उन्हें जो गहन उपदेश दिया, वह श्रीमद्भागवत के एकादश स्कंध में, लगभग सातवें से उनतीसवें अध्याय तक, वर्णित है। इसे "उद्धव गीता" या "हंस गीता" के नाम से भी जाना जाता है।

इस उपदेश के आरंभ में भगवान एक अवधूत की कथा सुनाते हैं, जिसने राजा यदु को बताया कि उसने प्रकृति से चौबीस गुरु बनाए हैं। पृथ्वी से क्षमा, वायु से अनासक्ति, आकाश से सर्वव्यापकता, जल से निर्मलता, अग्नि, चंद्रमा और सूर्य से भी उसने शिक्षा ली। कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंगा, मधुमक्खी, हाथी, मधु निकालने वाला, हिरण, मछली, पिंगला नामक स्त्री, कुरर पक्षी, बालक, कुमारी कन्या, बाण बनाने वाला, सर्प, मकड़ी और भृंगी कीट भी उसके गुरु बने। परंपरा में इस अवधूत को भगवान दत्तात्रेय माना जाता है। संदेश यह है कि जागरूक मन के लिए सारा संसार ही शिक्षक है।

इसके बाद भगवान भक्ति की महिमा बताते हैं कि तप, योग या विद्या से भी बढ़कर उन्हें प्रेमपूर्ण भक्ति प्रिय है। वे सच्चे वैराग्य, इंद्रियों के संयम, सत्संग और विविध साधनाओं को समझाते हैं, तथा सिखाते हैं कि हर प्राणी में भगवान को देखना ही सबसे ऊँची साधना है।

उपदेश पूरा होने पर भगवान ने उद्धवजी को बदरिकाश्रम जाकर साधना करने की आज्ञा दी। उद्धवजी ने प्रभु की चरणपादुकाएँ सिर पर धारण कीं और आज्ञा का पालन किया।

Source
Shrimad Bhagavatam, Canto 11 (approx. ch. 7–29)

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