महाभारत की प्रमुख घटनाएँ
पांडवों के जन्म से लेकर महाप्रस्थान तक, महाभारत की मुख्य घटनाएँ क्रम से, जिनमें भगवान श्रीकृष्ण बार-बार धर्म की रक्षा करते हैं।
महाभारत की कथा राजा पांडु के पाँच पुत्रों, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव के जन्म से आरंभ होती है। हस्तिनापुर में कौरवों के साथ उनका पालन-पोषण होता है, पर दुर्योधन के मन में ईर्ष्या बढ़ती जाती है। वारणावत में लाक्षागृह (लाख का महल) में उन्हें जलाने का षड्यंत्र रचा गया, पर विदुरजी की सावधानी से पांडव माता कुंती सहित सुरंग से बच निकले।
गुप्त वेश में रहते हुए अर्जुन ने पांचाल में द्रौपदी के स्वयंवर में मत्स्य-भेद करके द्रौपदी को प्राप्त किया। यहीं से पांडवों और भगवान श्रीकृष्ण की घनिष्ठता बढ़ी। राज्य के बँटवारे में पांडवों को खांडवप्रस्थ मिला, जहाँ उन्होंने इंद्रप्रस्थ नगर बसाया। युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया, जिसमें श्रीकृष्ण को प्रथम पूजा का सम्मान मिला और शिशुपाल का वध हुआ।
पांडवों का वैभव देखकर दुर्योधन ने शकुनि की सहायता से द्यूतक्रीड़ा का आयोजन किया। युधिष्ठिर सब कुछ हार गए और भरी सभा में द्रौपदी का अपमान हुआ, तब परंपरा के अनुसार श्रीकृष्ण ने उनकी लाज रखी। पांडवों को बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास मिला, जो उन्होंने विराट नगर में वेश बदलकर बिताया।
अवधि पूरी होने पर भी दुर्योधन ने राज्य लौटाने से मना किया। श्रीकृष्ण शांतिदूत बनकर हस्तिनापुर गए, पर दुर्योधन ने सुई की नोक भर भूमि देने से भी इनकार कर दिया। फिर कुरुक्षेत्र में अठारह दिन का युद्ध हुआ, जिसके आरंभ में गीता का उपदेश हुआ। भीष्म पितामह शरशय्या पर लेटे रहे और उत्तरायण आने पर देह त्यागी। युद्ध के बाद युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हुआ और उन्होंने अश्वमेध यज्ञ किया।
कई वर्षों बाद मौसल पर्व में यदुवंश का अंत हुआ और श्रीकृष्ण स्वधाम पधारे। यह समाचार पाकर पांडवों ने परीक्षित को राज्य सौंपा और द्रौपदी सहित हिमालय की ओर महाप्रस्थान किया।
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- Mahabharata