भगवद् गीता वर्ल्ड

अनुगीता

महाभारत के आश्वमेधिक पर्व में, युद्ध के बाद अर्जुन के अनुरोध पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया पुनः उपदेश।

कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त होने और युधिष्ठिर के राज्याभिषेक के बाद एक दिन भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन इंद्रप्रस्थ की सुंदर सभा में साथ बैठे थे। तब अर्जुन ने विनम्रता से कहा कि युद्ध से पहले प्रभु ने जो ज्ञान दिया था, वह मन की चंचलता के कारण उन्हें ठीक से याद नहीं रहा, कृपया उसे फिर से सुनाएँ। यह प्रसंग महाभारत के आश्वमेधिक पर्व में आता है, और इस उपदेश को "अनुगीता" कहा जाता है, अर्थात गीता के बाद आने वाली गीता।

श्रीकृष्ण ने कुछ खेद प्रकट करते हुए कहा कि अर्जुन ने उस ज्ञान को सँभालकर नहीं रखा। उन्होंने यह भी कहा कि उस समय वे योगयुक्त अवस्था में थे और अब ठीक वैसे ही शब्द नहीं दोहरा सकते। फिर भी, अर्जुन पर कृपा करके उन्होंने वही सार प्राचीन कथाओं के माध्यम से फिर समझाया।

अनुगीता में एक सिद्ध महात्मा और कश्यप ऋषि का संवाद, एक ब्राह्मण और उनकी पत्नी का संवाद, तथा गुरु और शिष्य का संवाद आता है। इनमें आत्मा का स्वरूप, जन्म और मृत्यु का चक्र, कर्म का फल, मन और इंद्रियों का संयम, तीन गुण और मोक्ष के साधन समझाए गए हैं।

अनुगीता भगवद्गीता जितनी प्रसिद्ध नहीं है, पर विद्वान इसे गीता के ज्ञान का पूरक मानते हैं। इसका एक सुंदर संदेश यह भी है कि आध्यात्मिक ज्ञान को केवल एक बार सुन लेना पर्याप्त नहीं, उसे बार-बार स्मरण और अभ्यास से जीवन में उतारना पड़ता है।

Source
Mahabharata, Ashvamedhika Parva

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