महाभारत और श्रीकृष्ण
महर्षि वेदव्यास रचित महाभारत 18 पर्वों और लगभग एक लाख श्लोकों का महाकाव्य है, जिसके केंद्र में भगवान श्रीकृष्ण का मार्गदर्शन है।
महाभारत विश्व के सबसे विशाल महाकाव्यों में से एक है। इसकी रचना महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने की। परंपरा के अनुसार व्यासजी ने इसे बोलकर सुनाया और भगवान गणेश ने इसे लिखा। गणेशजी की शर्त थी कि लेखनी रुकनी नहीं चाहिए, और व्यासजी की शर्त थी कि गणेशजी हर श्लोक का अर्थ समझकर ही लिखें। इसी कारण व्यासजी बीच-बीच में कठिन श्लोक रचते, ताकि उन्हें सोचने का समय मिल सके।
महाभारत 18 पर्वों में विभाजित है और इसमें लगभग एक लाख श्लोक हैं, इसलिए इसे "शतसाहस्री संहिता" भी कहा जाता है। हरिवंश को इसका परिशिष्ट माना जाता है। इसे "पंचम वेद" भी कहा गया है, क्योंकि इसमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों का विस्तार से विवेचन है। प्रसिद्ध कथन है कि जो इसमें है वह अन्यत्र भी मिल सकता है, पर जो इसमें नहीं है वह कहीं नहीं है।
इसकी मुख्य कथा कुरुवंश के दो पक्षों, कौरवों और पांडवों के संघर्ष की है, जो अंततः कुरुक्षेत्र के युद्ध में परिणत होता है। भगवान श्रीकृष्ण इस महाकाव्य के केंद्र में हैं। वे पांडवों के मित्र, सखा और मार्गदर्शक हैं, द्रौपदी के रक्षक हैं, शांति के दूत बनकर हस्तिनापुर जाते हैं, और युद्ध में शस्त्र न उठाने का वचन देकर अर्जुन के सारथी बनते हैं। युद्ध से पहले उन्होंने अर्जुन को भगवद्गीता का उपदेश दिया, जो भीष्म पर्व का अंग है।
महाभारत केवल युद्ध की कथा नहीं है। इसमें अनेक उपाख्यान हैं, जैसे नल-दमयंती, सावित्री-सत्यवान और शकुंतला की कथाएँ, तथा शांति पर्व में भीष्म पितामह का राजधर्म और मोक्षधर्म पर उपदेश। यह मनुष्य के भीतर धर्म और अधर्म के संघर्ष का दर्पण है।
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- Mahabharata
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