श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 52
अध्याय 18 – मोक्षसंन्यासयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
viviktasevī laghvāśī yatavākkāyamānasaḥ .
dhyānayogaparo nityaṃ vairāgyaṃ samupāśritaḥ ॥
अर्थ
एकान्त स्थान का सेवन करने वाला, हल्का और थोड़ा भोजन करने वाला, वाणी, शरीर और मन को संयमित रखने वाला, सदा ध्यानयोग में तत्पर रहने वाला और वैराग्य का भली-भाँति आश्रय लेने वाला —
शब्दार्थ
- विविक्तसेवी – एकान्त और शुद्ध स्थान का सेवन करने वाला
- लघ्वाशी – हल्का और मित भोजन करने वाला
- यतवाक्कायमानसः – जिसने वाणी, शरीर और मन को संयमित कर लिया है
- ध्यानयोगपरः – ध्यानयोग में तत्पर
- नित्यम् – सदा, नियमित रूप से
- वैराग्यम् – वैराग्य का
- समुपाश्रितः – भली-भाँति आश्रय लिए हुए
अन्वय
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः नित्यं ध्यानयोगपरः वैराग्यं समुपाश्रितः —
व्याख्या
यह श्लोक ब्रह्म-प्राप्ति के साधक की जीवन-शैली का व्यावहारिक चित्र देता है। पहला लक्षण है ‘विविक्तसेवी’ — एकान्त का सेवन करने वाला। इसका अर्थ समाज से भागना नहीं, बल्कि नियमित रूप से ऐसा समय और स्थान बनाना है जहाँ मन बाहरी कोलाहल से मुक्त होकर भीतर देख सके। शंकराचार्य इसे जंगल, नदी-तट, पर्वत-गुफा जैसे शान्त और शुद्ध स्थान बताते हैं। आज के जीवन में इसका अर्थ दिन का एक शान्त समय या घर का एक शान्त कोना भी हो सकता है।
दूसरा है ‘लघ्वाशी’ — हल्का और मित भोजन करने वाला। भोजन का मन पर गहरा प्रभाव होता है। भारी, अधिक या तामसिक भोजन से आलस्य और निद्रा आती है, जो ध्यान में बाधक है। छठे अध्याय (6.16–17) में भी भगवान ने कहा था कि योग न अधिक खाने वाले का सिद्ध होता है, न बिल्कुल न खाने वाले का; युक्त आहार-विहार वाले का ही योग दुःखों का नाश करता है।
तीसरा है ‘यतवाक्कायमानसः’ — वाणी, शरीर और मन का संयम। अनावश्यक बोलना, शरीर की चंचलता और मन का भटकना — ये तीनों ऊर्जा को बिखेरते हैं। संयम से यह ऊर्जा एकत्रित होकर ध्यान में लगती है।
चौथा है ‘ध्यानयोगपरो नित्यम्’ — सदा ध्यानयोग में तत्पर। शंकराचार्य ध्यान को आत्म-स्वरूप का चिन्तन और योग को उसी में चित्त की एकाग्रता बताते हैं। ‘नित्यम्’ शब्द नियमितता पर बल देता है — कभी-कभार नहीं, प्रतिदिन। पाँचवाँ है ‘वैराग्यं समुपाश्रितः’ — वैराग्य का दृढ़ आश्रय। वैराग्य का अर्थ संसार से घृणा नहीं, बल्कि यह बोध है कि कोई भी नश्वर वस्तु स्थायी सुख नहीं दे सकती। यह बोध ही मन को परमात्मा की ओर मोड़ता है।
प्रसंग
यह श्लोक 18.51 से आरम्भ हुए वाक्य का मध्य भाग है, जिसमें ब्रह्म-प्राप्ति के साधक के लक्षण बताए जा रहे हैं। अगले श्लोक (18.53) में यह वाक्य पूर्ण होता है कि ऐसा साधक ब्रह्म-भाव के योग्य होता है।
जीवन-शिक्षा
प्रतिदिन कुछ समय एकान्त और मौन में बिताएँ। भोजन, वाणी और व्यवहार में संयम रखें — ये ध्यान की नींव हैं। नियमित साधना और यह स्मरण कि नश्वर वस्तुएँ स्थायी सुख नहीं दे सकतीं, मन को धीरे-धीरे परमात्मा की ओर मोड़ते हैं।
मुख्य शब्द
- विविक्तसेवी
- एकान्त का सेवन करने वाला
- लघ्वाशी
- हल्का और मित भोजन करने वाला
- यतवाक्कायमानस
- वाणी, शरीर और मन को संयमित रखने वाला
- ध्यानयोग
- परमात्मा या आत्मा में मन को एकाग्र करने का अभ्यास
- वैराग्य
- नश्वर वस्तुओं के प्रति अनासक्ति
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 18.47 – श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्
- गीता 18.48 – सहजं कर्म कौन्तेय
- गीता 18.49 – असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा
- गीता 18.50 – सिद्धिं प्राप्तो यथा
- गीता 18.51 – बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो
- गीता 18.53 – अहंकारं बलं दर्पं
- गीता 18.54 – ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न
- गीता 18.55 – भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि
- गीता 18.56 – सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो
- गीता 18.57 – चेतसा सर्वकर्माणि मयि