श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 47
अध्याय 18 – मोक्षसंन्यासयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
śreyānsvadharmo viguṇaḥ paradharmātsvanuṣṭhitāt .
svabhāvaniyataṃ karma kurvannāpnoti kilbiṣam ॥
अर्थ
भली-भाँति आचरण किए गए दूसरे के धर्म से गुणरहित (कमियों वाला) अपना धर्म श्रेष्ठ है; क्योंकि स्वभाव से नियत किए हुए कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को प्राप्त नहीं होता
शब्दार्थ
- श्रेयान् – श्रेष्ठ, अधिक कल्याणकारी
- स्वधर्मः – अपना धर्म, अपने स्वभाव के अनुकूल कर्तव्य
- विगुणः – गुणरहित, कमियों से युक्त
- परधर्मात् – दूसरे के धर्म से
- स्वनुष्ठितात् – भली-भाँति आचरण किए गए
- स्वभावनियतम् – स्वभाव द्वारा निर्धारित
- कर्म – कर्म
- कुर्वन् – करता हुआ
- न आप्नोति – प्राप्त नहीं करता
- किल्बिषम् – पाप
अन्वय
स्वनुष्ठितात् परधर्मात् विगुणः स्वधर्मः श्रेयान्; स्वभावनियतं कर्म कुर्वन् किल्बिषं न आप्नोति ।
व्याख्या
यह श्लोक गीता के सबसे प्रसिद्ध सिद्धान्तों में से एक को दोहराता है। तीसरे अध्याय (3.35) में भगवान ने कहा था — ‘श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्, स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।’ यहाँ अठारहवें अध्याय में, स्वभाव और वर्ण-धर्म के विवेचन के बाद, वही सिद्धान्त और भी गहरे आधार के साथ प्रस्तुत किया गया है। इसकी पुनरावृत्ति ही बताती है कि यह गीता का कितना केन्द्रीय विचार है।
श्लोक का अर्थ है: अपना धर्म, भले ही ‘विगुण’ हो — अर्थात् उसमें कमियाँ हों, वह पूर्णता से न हो पाए — वह दूसरे के उस धर्म से श्रेष्ठ है जो भले ही ‘स्वनुष्ठित’ — बहुत अच्छी तरह — किया जाए। यह पहली दृष्टि में विचित्र लगता है: अधूरा अपना कर्म पूर्ण पराये कर्म से श्रेष्ठ कैसे? इसका उत्तर ‘स्वभावनियतं कर्म’ शब्दों में है। अपना धर्म हमारे स्वभाव से उपजा है; वह हमारी प्रकृति के अनुकूल है। पराया धर्म, चाहे बाहर से कितना भी आकर्षक लगे, हमारे स्वभाव के विरुद्ध है, और इसलिए भीतर संघर्ष, असन्तोष और अशान्ति पैदा करता है।
अर्जुन के प्रसंग में यह बात सीधी लागू होती है। अर्जुन क्षत्रिय है; उसका स्वधर्म युद्ध है, जो हिंसा और कष्ट से युक्त होने के कारण ‘विगुण’ प्रतीत होता है। दूसरी ओर, भिक्षा माँगकर जीना और अहिंसा का पालन करना (2.5) संन्यासी का धर्म है, जो बाहर से अधिक पवित्र दिखता है। भगवान कहते हैं — तेरे लिए तेरा युद्ध-रूप स्वधर्म ही श्रेष्ठ है; संन्यासी का धर्म तेरे लिए परधर्म है।
‘किल्बिषं नाप्नोति’ — स्वभाव-नियत कर्म करने वाला पाप को प्राप्त नहीं होता। यहाँ अर्जुन की उस आशंका का उत्तर है कि युद्ध में स्वजनों को मारने से पाप लगेगा (1.36)। भगवान आश्वस्त करते हैं कि अनासक्त भाव से, धर्म की रक्षा के लिए किया गया स्वधर्म-पालन पाप नहीं है। शंकराचार्य कहते हैं कि जैसे विष से उत्पन्न कीड़े को विष हानि नहीं पहुँचाता, वैसे ही स्वभाव से उत्पन्न कर्म करने वाले को उसका दोष नहीं लगता।
आधुनिक जीवन में यह सिद्धान्त अत्यन्त प्रासंगिक है। आज बहुत से लोग दूसरों की सफलता देखकर अपना मार्ग बदल लेते हैं — केवल इसलिए कि कोई अन्य करियर अधिक प्रतिष्ठित या लाभदायक दिखता है — और फिर जीवनभर असन्तुष्ट रहते हैं। गीता कहती है: अपनी प्रकृति को पहचानो, अपने मार्ग पर चलो; भले ही उसमें तुम पूर्ण न हो, वह तुम्हें वह शान्ति और विकास देगा जो दूसरे का मार्ग कभी नहीं दे सकता।
यह भी समझना चाहिए कि ‘स्वधर्म’ का अर्थ केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि अपने जीवन की वह भूमिका है जो परिस्थिति, सामर्थ्य और स्वभाव ने हमें सौंपी है — पुत्र, माता-पिता, नागरिक, शिष्य, सहकर्मी के रूप में। इन भूमिकाओं को ईमानदारी से निभाना ही स्वधर्म-पालन है।
प्रसंग
पिछले श्लोक में बताया गया कि अपने कर्म से भगवान की पूजा करके सिद्धि मिलती है। यह श्लोक स्वधर्म की श्रेष्ठता बताता है। अगले श्लोक (18.48) में भगवान कहते हैं कि सहज कर्म दोषयुक्त होने पर भी नहीं छोड़ना चाहिए।
जीवन-शिक्षा
दूसरों की नकल करके उनका मार्ग अपनाने के बजाय अपनी प्रकृति और प्रतिभा के अनुकूल मार्ग चुनें। अपने कर्तव्य में अपूर्णता से निराश न हों; अपने मार्ग पर अधूरा चलना भी पराये मार्ग पर पूरा चलने से श्रेष्ठ है। जो भूमिका जीवन ने आपको दी है, उसे पूरी ईमानदारी से निभाएँ।
मुख्य शब्द
- स्वधर्म
- अपने स्वभाव और स्थिति के अनुकूल कर्तव्य
- परधर्म
- दूसरे के स्वभाव का कर्तव्य, जो अपने लिए अनुकूल नहीं
- विगुण
- कमियों वाला, अपूर्ण
- स्वनुष्ठित
- भली-भाँति आचरण किया गया
- किल्बिष
- पाप, दोष
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 18.42 – शमो दमस्तपः शौचं
- गीता 18.43 – शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं
- गीता 18.44 – कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्
- गीता 18.45 – स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः
- गीता 18.46 – यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन
- गीता 18.48 – सहजं कर्म कौन्तेय
- गीता 18.49 – असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा
- गीता 18.50 – सिद्धिं प्राप्तो यथा
- गीता 18.51 – बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो
- गीता 18.52 – विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः