श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 54
अध्याय 18 – मोक्षसंन्यासयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
brahmabhūtaḥ prasannātmā na śocati na kāṅkṣati .
samaḥ sarveṣu bhūteṣu madbhaktiṃ labhate parām ॥
अर्थ
ब्रह्मभूत (ब्रह्म में स्थित) और प्रसन्न चित्त वाला पुरुष न शोक करता है, न कुछ चाहता है; सब प्राणियों में समभाव वाला वह मेरी परा भक्ति को प्राप्त करता है
शब्दार्थ
- ब्रह्मभूतः – ब्रह्मरूप हुआ, ब्रह्म में स्थित
- प्रसन्नात्मा – प्रसन्न, निर्मल चित्त वाला
- न शोचति – शोक नहीं करता
- न काङ्क्षति – कामना नहीं करता
- समः – समभाव वाला
- सर्वेषु – सब
- भूतेषु – प्राणियों में
- मद्भक्तिम् – मेरी भक्ति को
- लभते – प्राप्त करता है
- पराम् – परा, सर्वोच्च
अन्वय
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति; सर्वेषु भूतेषु समः (सः) मद्भक्तिं परां लभते ।
व्याख्या
यह श्लोक गीता के सबसे गहन और महत्त्वपूर्ण श्लोकों में से एक है, क्योंकि यह ज्ञान और भक्ति के सम्बन्ध पर निर्णायक प्रकाश डालता है। पिछले श्लोक में साधक ब्रह्म-भाव के योग्य हुआ; अब वह ‘ब्रह्मभूत’ हो गया है — ब्रह्म में पूर्णतः स्थित। उसकी अवस्था के चार लक्षण बताए गए हैं।
पहला है ‘प्रसन्नात्मा’ — उसका चित्त निर्मल और प्रसन्न है, जैसे शरद ऋतु का स्वच्छ जल। दूसरा और तीसरा है ‘न शोचति न काङ्क्षति’ — वह न किसी खोई हुई वस्तु के लिए शोक करता है, न किसी अप्राप्त वस्तु की कामना करता है। शोक भूतकाल से बँधा है और कामना भविष्य से; जो इन दोनों से मुक्त है, वह वर्तमान की पूर्णता में स्थित है। बारहवें अध्याय (12.17) में भी भक्त का यही लक्षण बताया गया था। चौथा है ‘समः सर्वेषु भूतेषु’ — वह सब प्राणियों में समभाव रखता है, क्योंकि वह सबमें एक ही ब्रह्म देखता है (18.20)।
अब आता है इस श्लोक का सबसे महत्त्वपूर्ण वाक्य: ‘मद्भक्तिं लभते पराम्’ — वह मेरी परा भक्ति प्राप्त करता है। यह आश्चर्यजनक बात है। सामान्यतः माना जाता है कि ब्रह्म-ज्ञान अन्तिम लक्ष्य है; पर भगवान कहते हैं कि ब्रह्मभूत होने के बाद भी कुछ प्राप्त करना शेष है — परा भक्ति। इसका अर्थ है कि भक्ति ज्ञान से नीचे का साधन नहीं, बल्कि ज्ञान की पराकाष्ठा है।
इस ‘परा भक्ति’ की व्याख्या में आचार्यों के दृष्टिकोण भिन्न हैं, और यह भेद महत्त्वपूर्ण है। शंकराचार्य के अनुसार परा भक्ति ही ज्ञान की चौथी और सर्वोच्च अवस्था है — सातवें अध्याय (7.16–17) में बताए गए चार प्रकार के भक्तों में ‘ज्ञानी’ भक्त की भक्ति। उनके मत में परा भक्ति और परम ज्ञान वस्तुतः एक ही हैं — वह ज्ञान-निष्ठा जिसमें परमात्मा का अपरोक्ष अनुभव होता है। रामानुजाचार्य के अनुसार ब्रह्मभूत का अर्थ है जीवात्मा के शुद्ध स्वरूप का साक्षात्कार; उसके बाद साधक को परमात्मा के प्रति वह प्रेममयी, अविच्छिन्न स्मृति रूप भक्ति प्राप्त होती है जो स्वयं परम आनन्दरूप है और जो मोक्ष का साक्षात् साधन है। मध्वाचार्य कहते हैं कि जीव कभी ब्रह्म नहीं बनता; ‘ब्रह्मभूत’ का अर्थ है ब्रह्म के प्रति अभिमुख, निर्मल अवस्था, जिसमें परा भक्ति खिलती है; और भक्ति मोक्ष में भी बनी रहती है।
तीनों मतों में एक बात समान है: ब्रह्म में स्थित होना और परमात्मा का प्रेम — ये विरोधी नहीं हैं। जितना अहंकार मिटता है, उतना ही प्रेम खिलता है। ज्ञान अहंकार को हटाता है, और अहंकार हटने पर जो बचता है, वह शुद्ध प्रेम है। नारद भक्ति-सूत्र भी परा भक्ति को परम प्रेम-रूपा और अमृत-स्वरूपा कहते हैं।
व्यावहारिक जीवन के लिए यह श्लोक बताता है कि सच्ची आध्यात्मिकता शुष्क नहीं होती। जो व्यक्ति वास्तव में आत्मज्ञान की ओर बढ़ता है, वह अधिक प्रसन्न, अधिक शान्त, अधिक करुणामय और अधिक प्रेमपूर्ण होता है — न कि कठोर और उदासीन।
प्रसंग
पिछले श्लोक में साधक ब्रह्म-भाव के योग्य हुआ। यह श्लोक ब्रह्मभूत अवस्था और उसके बाद प्राप्त होने वाली परा भक्ति का वर्णन करता है। अगले श्लोक (18.55) में बताया गया है कि इस भक्ति से वह भगवान को तत्त्व से जानकर उनमें प्रवेश करता है।
जीवन-शिक्षा
जो बीत गया उसका शोक और जो नहीं मिला उसकी लालसा — इन दोनों से मुक्त होकर वर्तमान में प्रसन्न रहना सीखें। सबके प्रति समभाव और करुणा ही आध्यात्मिक उन्नति का प्रमाण है। ज्ञान का अन्तिम फल शुष्कता नहीं, बल्कि गहरा प्रेम है।
मुख्य शब्द
- ब्रह्मभूत
- ब्रह्म में स्थित, ब्रह्मरूप हुआ
- प्रसन्नात्मा
- निर्मल और प्रसन्न चित्त वाला
- परा भक्ति
- सर्वोच्च भक्ति — ज्ञान की पराकाष्ठा या परम प्रेम
- समत्व
- सब प्राणियों में समान दृष्टि
- न शोचति न काङ्क्षति
- न शोक, न कामना — भूत और भविष्य से मुक्ति
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 18.49 – असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा
- गीता 18.50 – सिद्धिं प्राप्तो यथा
- गीता 18.51 – बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो
- गीता 18.52 – विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः
- गीता 18.53 – अहंकारं बलं दर्पं
- गीता 18.55 – भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि
- गीता 18.56 – सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो
- गीता 18.57 – चेतसा सर्वकर्माणि मयि
- गीता 18.58 – मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि
- गीता 18.59 – यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य