श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 50
अध्याय 18 – मोक्षसंन्यासयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे ।
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
siddhiṃ prāpto yathā brahma tathāpnoti nibodha me .
samāsenaiva kaunteya niṣṭhā jñānasya yā parā ॥
अर्थ
हे कुन्तीपुत्र! नैष्कर्म्य-सिद्धि को प्राप्त हुआ पुरुष जिस प्रकार ब्रह्म को प्राप्त होता है, और जो ज्ञान की परा निष्ठा है, उसे तुम मुझसे संक्षेप में ही जानो
शब्दार्थ
- सिद्धिम् – सिद्धि को
- प्राप्तः – प्राप्त हुआ
- यथा – जिस प्रकार
- ब्रह्म – ब्रह्म को
- तथा – उस प्रकार
- आप्नोति – प्राप्त होता है
- निबोध – जानो, समझो
- मे – मुझसे
- समासेन – संक्षेप में
- एव – ही
- कौन्तेय – हे कुन्तीपुत्र
- निष्ठा – निष्ठा, पराकाष्ठा, अन्तिम स्थिति
- ज्ञानस्य – ज्ञान की
- या – जो
- परा – परम
अन्वय
कौन्तेय, सिद्धिं प्राप्तः यथा ब्रह्म आप्नोति, तथा ज्ञानस्य या परा निष्ठा (तां) समासेन एव मे निबोध ।
व्याख्या
यह श्लोक आगे आने वाले विवेचन (18.51–53) की भूमिका है। भगवान कहते हैं कि नैष्कर्म्य-सिद्धि प्राप्त करने के बाद साधक ब्रह्म को कैसे प्राप्त होता है — यह मैं संक्षेप में बताऊँगा। ‘ज्ञानस्य या परा निष्ठा’ — यही ज्ञान की परम निष्ठा, अर्थात् ज्ञान की चरम परिणति है।
यहाँ एक क्रमिक आध्यात्मिक यात्रा दिखाई देती है। पहला चरण था स्वधर्म का निष्काम पालन (18.45–48), जिससे चित्त शुद्ध होता है। दूसरा चरण है नैष्कर्म्य-सिद्धि (18.49), जहाँ आसक्ति और कर्तृत्व मिट जाते हैं। तीसरा चरण है ब्रह्म-प्राप्ति, जिसके साधन अगले श्लोकों में बताए जाएँगे। और चौथा चरण है परा भक्ति (18.54–55)। यह क्रम दिखाता है कि गीता में कर्म, ज्ञान और भक्ति अलग-अलग मार्ग नहीं, बल्कि एक ही यात्रा के पड़ाव हैं।
‘समासेनैव’ — संक्षेप में ही — शब्द यह बताता है कि यह विषय छठे, बारहवें और तेरहवें अध्यायों में विस्तार से कहा जा चुका है; अब उसका सार दिया जा रहा है। ‘निष्ठा’ का अर्थ है वह अवस्था जिसमें साधक पूर्णतः स्थित हो जाता है।
शंकराचार्य यहाँ बहुत विस्तार से समझाते हैं कि ब्रह्म-प्राप्ति का अर्थ किसी नई वस्तु को पाना नहीं, क्योंकि ब्रह्म तो आत्मा का ही स्वरूप है; इसका अर्थ है अज्ञान के आवरण का हटना — जैसे बादल हटने पर सूर्य प्रकट होता है। रामानुजाचार्य ‘ब्रह्म’ को यहाँ जीवात्मा का शुद्ध स्वरूप मानते हैं, जिसके साक्षात्कार के बाद परमात्मा की परा भक्ति प्राप्त होती है।
प्रसंग
पिछले श्लोक में नैष्कर्म्य-सिद्धि की प्राप्ति बताई गई। यह श्लोक अगले विवेचन की भूमिका है कि इस सिद्धि के बाद ब्रह्म-प्राप्ति कैसे होती है। अगले तीन श्लोकों (18.51–53) में इसके साधन बताए गए हैं।
जीवन-शिक्षा
आध्यात्मिक जीवन एक क्रमिक यात्रा है — कर्तव्य से शुद्धि, शुद्धि से ज्ञान, और ज्ञान से भक्ति। हर चरण को धैर्य से पूरा करें; कोई भी चरण व्यर्थ नहीं जाता। जो प्राप्त करना है, वह पहले से हमारे भीतर है; केवल आवरण हटाना है।
मुख्य शब्द
- ज्ञान की परा निष्ठा
- ज्ञान की चरम अवस्था, ब्रह्म में पूर्ण स्थिति
- ब्रह्म
- परम सत्य, अनन्त चेतना
- समास
- संक्षेप
- निष्ठा
- दृढ़ स्थिति, पराकाष्ठा
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 18.45 – स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः
- गीता 18.46 – यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन
- गीता 18.47 – श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्
- गीता 18.48 – सहजं कर्म कौन्तेय
- गीता 18.49 – असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा
- गीता 18.51 – बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो
- गीता 18.52 – विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः
- गीता 18.53 – अहंकारं बलं दर्पं
- गीता 18.54 – ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न
- गीता 18.55 – भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि