श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 49
अध्याय 18 – मोक्षसंन्यासयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
asaktabuddhiḥ sarvatra jitātmā vigataspṛhaḥ .
naiṣkarmyasiddhiṃ paramāṃ saṃnyāsenādhigacchati ॥
अर्थ
जिसकी बुद्धि सर्वत्र आसक्तिरहित है, जिसने अपने मन को जीत लिया है और जो स्पृहा (कामना) से रहित है, वह संन्यास के द्वारा परम नैष्कर्म्य-सिद्धि को प्राप्त होता है
शब्दार्थ
- असक्तबुद्धिः – आसक्तिरहित बुद्धि वाला
- सर्वत्र – सब जगह, सब विषयों में
- जितात्मा – जिसने मन (अन्तःकरण) को जीत लिया है
- विगतस्पृहः – जिसकी स्पृहा (लालसा) नष्ट हो गई है
- नैष्कर्म्यसिद्धिम् – नैष्कर्म्य (कर्म-बन्धन से मुक्ति) की सिद्धि को
- परमाम् – परम
- संन्यासेन – संन्यास के द्वारा
- अधिगच्छति – प्राप्त होता है
अन्वय
सर्वत्र असक्तबुद्धिः जितात्मा विगतस्पृहः संन्यासेन परमां नैष्कर्म्यसिद्धिम् अधिगच्छति ।
व्याख्या
स्वधर्म-पालन से चित्त शुद्ध होने के बाद साधक की अगली अवस्था क्या है? इस श्लोक से भगवान उस आध्यात्मिक यात्रा का वर्णन आरम्भ करते हैं जो कर्मयोग से ज्ञाननिष्ठा और फिर परा भक्ति तक जाती है (18.49–55)। यहाँ ‘नैष्कर्म्यसिद्धि’ — कर्म के बन्धन से पूर्ण मुक्ति की अवस्था — की प्राप्ति बताई गई है।
तीन योग्यताएँ बताई गई हैं। ‘असक्तबुद्धिः सर्वत्र’ — जिसकी बुद्धि कहीं भी, किसी भी व्यक्ति, वस्तु या परिणाम में आसक्त नहीं है। ‘जितात्मा’ — जिसने अपने मन और इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर ली है। ‘विगतस्पृहः’ — जिसकी सभी लालसाएँ — शरीर, जीवन या भोगों की — शान्त हो गई हैं। ये तीनों मिलकर एक ऐसे अन्तःकरण का चित्र बनाते हैं जो पूरी तरह निर्मल और स्वतन्त्र है।
‘नैष्कर्म्य’ का अर्थ कर्म का अभाव नहीं, बल्कि कर्म के बन्धन का अभाव है। तीसरे अध्याय (3.4) में भगवान ने कहा था कि कर्म न करने मात्र से कोई नैष्कर्म्य नहीं पाता। नैष्कर्म्य वह अवस्था है जहाँ व्यक्ति कर्म करते हुए भी अकर्ता है, क्योंकि उसमें कर्तृत्व का अभिमान नहीं रहा। चौथे अध्याय (4.18) के शब्दों में, वह कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है।
यहाँ ‘संन्यासेन’ शब्द की व्याख्या में आचार्यों में सूक्ष्म भेद है। शंकराचार्य इसे सम्यक् ज्ञान से उत्पन्न सर्वकर्म-संन्यास मानते हैं — जब आत्मा के अकर्ता होने का ज्ञान दृढ़ हो जाता है, तब कर्म स्वाभाविक रूप से छूट जाते हैं; यही परम नैष्कर्म्य-सिद्धि है। रामानुजाचार्य ‘संन्यास’ को 18.4–9 में बताए गए त्याग — अर्थात् फल, आसक्ति और कर्तृत्व के त्याग — के अर्थ में लेते हैं; उनके अनुसार कर्मयोगी इसी त्याग से ध्याननिष्ठा की सिद्धि पाता है। इस प्रकार अध्याय के आरम्भ में उठा संन्यास-त्याग का प्रश्न यहाँ एक नई ऊँचाई पर पहुँचता है।
प्रसंग
पिछले श्लोकों (18.41–48) में स्वधर्म-पालन का महत्त्व बताया गया। यह श्लोक बताता है कि अनासक्त होकर कर्म करने वाला अन्ततः नैष्कर्म्य-सिद्धि प्राप्त करता है। अगले श्लोक (18.50) में भगवान बताते हैं कि इस सिद्धि को प्राप्त करके ब्रह्म की प्राप्ति कैसे होती है।
जीवन-शिक्षा
आसक्ति, अनियन्त्रित मन और लालसा — ये तीन बन्धन हैं; इन्हें धीरे-धीरे ढीला करने का अभ्यास करें। कर्म से भागना मुक्ति नहीं; कर्म करते हुए भी भीतर से मुक्त रहना ही वास्तविक स्वतन्त्रता है। मन जितना कम चाहता है, उतना अधिक स्वतन्त्र होता है।
मुख्य शब्द
- नैष्कर्म्य
- कर्म के बन्धन से पूर्ण मुक्ति, अकर्तृत्व की अवस्था
- असक्तबुद्धि
- जिसकी बुद्धि कहीं आसक्त नहीं
- जितात्मा
- मन और इन्द्रियों को जीतने वाला
- विगतस्पृह
- लालसाओं से रहित
- संन्यास
- त्याग — कर्तृत्व, आसक्ति और फल का; ज्ञानजन्य कर्मत्याग
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 18.44 – कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्
- गीता 18.45 – स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः
- गीता 18.46 – यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन
- गीता 18.47 – श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्
- गीता 18.48 – सहजं कर्म कौन्तेय
- गीता 18.50 – सिद्धिं प्राप्तो यथा
- गीता 18.51 – बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो
- गीता 18.52 – विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः
- गीता 18.53 – अहंकारं बलं दर्पं
- गीता 18.54 – ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न