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श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 56

अध्याय 18 – मोक्षसंन्यासयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

sarvakarmāṇyapi sadā kurvāṇo madvyapāśrayaḥ .
matprasādādavāpnoti śāśvataṃ padamavyayam ॥

अर्थ

मेरा आश्रय लेने वाला भक्त सदा सब कर्म करता हुआ भी मेरी कृपा से शाश्वत और अविनाशी परम पद को प्राप्त कर लेता है

शब्दार्थ

  • सर्वकर्माणि – सब कर्मों को
  • अपि – भी
  • सदा – सदा
  • कुर्वाणः – करता हुआ
  • मद्व्यपाश्रयः – मुझ पर पूर्ण रूप से आश्रित
  • मत्प्रसादात् – मेरी कृपा से
  • अवाप्नोति – प्राप्त करता है
  • शाश्वतम् – शाश्वत, सनातन
  • पदम् – पद, धाम
  • अव्ययम् – अविनाशी

अन्वय

मद्व्यपाश्रयः सदा सर्वकर्माणि अपि कुर्वाणः मत्प्रसादात् शाश्वतम् अव्ययं पदम् अवाप्नोति ।

व्याख्या

पिछले श्लोकों (18.49–55) में बताया गया मार्ग — नैष्कर्म्य, एकान्त, ध्यान, वैराग्य — अत्यन्त ऊँचा और कठिन है। स्वाभाविक प्रश्न उठता है: क्या केवल वही लोग परम पद पा सकते हैं जो संसार छोड़कर एकान्त में ध्यान करें? इस श्लोक में भगवान एक करुणामय और सुलभ उत्तर देते हैं: ‘सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः’ — सदा सब कर्म करता हुआ भी, यदि वह मेरा आश्रय लेता है, तो वह भी परम पद पाता है।

‘मद्व्यपाश्रयः’ — इस शब्द में ‘वि’ और ‘अप’ उपसर्ग आश्रय की पूर्णता बताते हैं। इसका अर्थ है पूरी तरह, हर प्रकार से मुझ पर निर्भर रहना — अपनी योजनाओं, अपने बल, अपनी बुद्धि पर नहीं, बल्कि भगवान पर। शंकराचार्य कहते हैं कि ऐसा भक्त अपने सब कर्मों को भगवान में अर्पित करके केवल उन्हीं को अपना आश्रय मानता है। रामानुजाचार्य बताते हैं कि यहाँ ‘सर्वकर्माणि’ में नित्य, नैमित्तिक और काम्य कर्म भी आ जाते हैं — सब कुछ भगवान की आराधना के रूप में।

इस श्लोक का सबसे महत्त्वपूर्ण शब्द है ‘मत्प्रसादात्’ — मेरी कृपा से। परम पद की प्राप्ति अन्ततः साधक के प्रयत्न का पुरस्कार नहीं, बल्कि भगवान की कृपा का दान है। साधक का कर्तव्य है आश्रय लेना और अपना कर्म अर्पित करना; शेष भगवान की कृपा करती है। यह अहंकार को भी मिटाता है, क्योंकि साधक जानता है कि उसकी उपलब्धि उसकी नहीं, भगवान की देन है।

‘शाश्वतं पदमव्ययम्’ — शाश्वत और अविनाशी पद। यह वह धाम या अवस्था है जो कभी नष्ट नहीं होती, जहाँ से लौटना नहीं होता। इस प्रकार यह श्लोक गृहस्थ, कर्मशील, संसार में रहने वाले साधक को भी आशा और आश्वासन देता है कि उसका मार्ग भी परम लक्ष्य तक पहुँचता है।

प्रसंग

पिछले श्लोकों में ध्याननिष्ठ साधक के परम पद तक पहुँचने का मार्ग बताया गया। यह श्लोक बताता है कि भगवान का आश्रय लेने वाला कर्मशील भक्त भी उनकी कृपा से वही पद पाता है। अगले श्लोक (18.57) में भगवान अर्जुन को सीधे यही मार्ग अपनाने का उपदेश देते हैं।

जीवन-शिक्षा

परमात्मा तक पहुँचने के लिए संसार छोड़ना आवश्यक नहीं; अपने सब कर्म करते हुए उनका आश्रय लेना पर्याप्त है। अपने बल से अधिक ईश्वर की कृपा पर भरोसा रखें। जो पूरे मन से उनकी शरण लेता है, उसकी यात्रा वे स्वयं पूरी करते हैं।

मुख्य शब्द

मद्व्यपाश्रय
पूर्ण रूप से भगवान पर आश्रित
प्रसाद
भगवान की कृपा
शाश्वत पद
सनातन धाम या परम अवस्था
अव्यय
अविनाशी

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