श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 57
अध्याय 18 – मोक्षसंन्यासयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
cetasā sarvakarmāṇi mayi saṃnyasya matparaḥ .
buddhiyogamupāśritya maccittaḥ satataṃ bhava ॥
अर्थ
मन से सब कर्मों को मुझमें अर्पित करके, मुझे ही परम लक्ष्य मानकर, बुद्धियोग का आश्रय लेकर तुम निरन्तर मुझमें चित्त लगाने वाले बनो
शब्दार्थ
- चेतसा – मन से, विवेकपूर्ण बुद्धि से
- सर्वकर्माणि – सब कर्मों को
- मयि – मुझमें
- संन्यस्य – अर्पित करके
- मत्परः – मुझे परम लक्ष्य मानने वाला
- बुद्धियोगम् – बुद्धियोग — समत्वबुद्धि
- उपाश्रित्य – आश्रय लेकर
- मच्चित्तः – मुझमें चित्त लगाने वाला
- सततम् – निरन्तर
- भव – हो जाओ
अन्वय
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य, मत्परः (भूत्वा), बुद्धियोगम् उपाश्रित्य सततं मच्चित्तः भव ।
व्याख्या
पिछले श्लोक में भगवान ने सामान्य सिद्धान्त बताया कि उनका आश्रय लेने वाला सब कर्म करता हुआ भी परम पद पाता है। अब वे सीधे अर्जुन को सम्बोधित करके यही मार्ग अपनाने का आदेश देते हैं। यहाँ उपदेश ‘वह’ से ‘तुम’ पर आ गया है — यह गीता का निर्णायक मोड़ है, जहाँ सिद्धान्त व्यक्तिगत आह्वान बन जाता है।
चार निर्देश दिए गए हैं। पहला है ‘चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य’ — मन से सब कर्मों को मुझमें अर्पित कर दो। यहाँ संन्यास का अर्थ है कर्मों का बाहरी त्याग नहीं, बल्कि ‘चेतसा’ — मन से — उनका समर्पण। अर्जुन युद्ध करेगा, पर ‘मैं कर रहा हूँ’ के भाव से नहीं, ‘भगवान का कर्म भगवान को अर्पित’ के भाव से। यही इस अध्याय के आरम्भ में उठे संन्यास-प्रश्न का अन्तिम समाधान है: सच्चा संन्यास भीतर का समर्पण है।
दूसरा है ‘मत्परः’ — मुझे ही परम लक्ष्य मानो। जीवन का अन्तिम उद्देश्य राज्य, यश या सुख नहीं, बल्कि परमात्मा हों। तीसरा है ‘बुद्धियोगमुपाश्रित्य’ — बुद्धियोग का आश्रय लो। दूसरे अध्याय (2.39–50) में बताया गया बुद्धियोग वह समत्व-बुद्धि है जिसमें सफलता-असफलता में मन सम रहता है। दसवें अध्याय (10.10) में भगवान ने कहा था कि प्रेमपूर्वक भजने वालों को मैं वह बुद्धियोग देता हूँ जिससे वे मुझे प्राप्त होते हैं।
चौथा और सबका सार है ‘मच्चित्तः सततं भव’ — निरन्तर मुझमें चित्त लगाए रहो। हर कर्म के बीच, हर परिस्थिति में, मन का एक भाग सदा भगवान में लगा रहे — जैसे माँ घर के सब काम करते हुए भी बच्चे का ध्यान रखती है। शंकराचार्य और रामानुजाचार्य दोनों इसे कर्मयोग और भक्तियोग के समन्वय का स्पष्ट निर्देश मानते हैं।
प्रसंग
पिछले श्लोक में सामान्य सिद्धान्त बताया गया कि भगवान का आश्रय लेने वाला कर्म करते हुए भी परम पद पाता है। यह श्लोक अर्जुन को सीधे यह मार्ग अपनाने का आदेश देता है। अगले श्लोक (18.58) में भगवान इस मार्ग का फल और इसे न अपनाने का परिणाम बताते हैं।
जीवन-शिक्षा
अपने सब कामों को मन से ईश्वर को अर्पित करें — कर्म छोड़ने की नहीं, अर्पण करने की आवश्यकता है। सफलता-असफलता में समबुद्धि रखें। काम करते हुए भी मन का एक कोना सदा ईश्वर के स्मरण में लगा रहे।
मुख्य शब्द
- चेतसा संन्यास
- मन से कर्मों का भगवान को समर्पण
- मत्पर
- भगवान को परम लक्ष्य मानने वाला
- बुद्धियोग
- समत्व-बुद्धि से युक्त कर्म का योग
- मच्चित्त
- जिसका चित्त भगवान में लगा हो
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 18.52 – विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः
- गीता 18.53 – अहंकारं बलं दर्पं
- गीता 18.54 – ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न
- गीता 18.55 – भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि
- गीता 18.56 – सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो
- गीता 18.58 – मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि
- गीता 18.59 – यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य
- गीता 18.60 – स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः
- गीता 18.61 – ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन
- गीता 18.62 – तमेव शरणं गच्छ