शरद पूर्णिमा (रास पूर्णिमा)
शरद ऋतु की पूर्ण चाँदनी रात, जब भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन में गोपियों के साथ महारास रचाया था।
शरद पूर्णिमा वर्ष की सबसे उज्ज्वल चाँदनी रातों में गिनी जाती है। श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में वर्णन है कि शरद ऋतु की ऐसी ही चाँदनी रात में, जब वन में मल्लिका के फूल खिले थे, भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी बाँसुरी बजाई। उस मधुर ध्वनि को सुनकर व्रज की गोपियाँ सब कुछ छोड़कर यमुना तट पर दौड़ी चली आईं। तब भगवान ने उनके साथ महारास किया और अपनी योगमाया से इतने रूप धारण किए कि प्रत्येक गोपी को लगा कि श्रीकृष्ण उसी के साथ नृत्य कर रहे हैं। भक्ति परंपरा में यह रास आत्मा और परमात्मा के शुद्ध, दिव्य प्रेम-मिलन का प्रतीक माना जाता है, सांसारिक प्रेम का नहीं।
यह पर्व आश्विन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है, जो अंग्रेज़ी कैलेंडर में प्रायः सितंबर के अंत या अक्टूबर में आती है। मान्यता है कि इस रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण होता है और उसकी किरणों में अमृत जैसा गुण होता है। कई प्रदेशों में यही रात कोजागरी पूर्णिमा के रूप में देवी लक्ष्मी की पूजा के लिए भी प्रसिद्ध है।
इस रात घरों और मंदिरों में दूध-चावल की खीर बनाकर चाँदनी में खुले आकाश के नीचे रखी जाती है और बाद में प्रसाद के रूप में बाँटी जाती है। वृंदावन के मंदिरों में भगवान का श्वेत वस्त्रों और चाँदनी जैसे श्रृंगार से सजाकर विशेष दर्शन होते हैं और रास-लीला का मंचन होता है।
गुजरात में शरद पूर्णिमा की रात लोग चाँदनी में गरबा और रास खेलते हैं, और दूध-पौआ बनाकर खाने की परंपरा है। खेड़ा ज़िले के डाकोर में रणछोड़राय जी के मंदिर में इस दिन बड़ा मेला लगता है और दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।
- Tithi
- आश्विन पूर्णिमा
- Month
- September–October
- Places
- Vrindavan, Mathura, Dakor, Gujarat
- Source
- Shrimad Bhagavatam, Canto 10