राधा अष्टमी
श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति श्रीराधा रानी के प्राकट्य का उत्सव, जो जन्माष्टमी के पंद्रह दिन बाद बरसाना में विशेष धूमधाम से मनाया जाता है।
राधा अष्टमी श्रीराधा रानी के प्राकट्य का दिन है। वैष्णव परंपरा में श्रीराधा को भगवान श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति, अर्थात उनके आनंद और प्रेम का स्वरूप माना जाता है। लोकप्रिय परंपरा के अनुसार वे राजा वृषभानु और माता कीर्ति की पुत्री थीं और उनका बचपन बरसाना में बीता। ब्रज में यह कहा जाता है कि "राधे" नाम के बिना कृष्ण-भक्ति अधूरी है, इसीलिए वहाँ अभिवादन भी "राधे-राधे" कहकर किया जाता है। उनका निःस्वार्थ प्रेम भक्ति का सर्वोच्च आदर्श माना जाता है, जिसमें अपने सुख की नहीं, केवल प्रियतम के सुख की चिंता रहती है।
यह पर्व भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को, जन्माष्टमी के ठीक पंद्रह दिन बाद, मनाया जाता है। अंग्रेज़ी कैलेंडर में यह सामान्यतः अगस्त के अंत या सितंबर में आता है। परंपरा के अनुसार श्रीराधा का प्राकट्य दोपहर के समय हुआ था, इसलिए मुख्य अभिषेक और आरती प्रायः मध्याह्न में होती है।
बरसाना की भानुगढ़ पहाड़ी पर स्थित श्रीजी (लाडली जी) मंदिर इस उत्सव का मुख्य केंद्र है। भोर से ही हज़ारों भक्त सीढ़ियाँ चढ़कर दर्शन के लिए पहुँचते हैं। श्रीराधा जी का दूध, दही, घी, शहद और जल से अभिषेक होता है, उन्हें नए वस्त्र और फूलों का श्रृंगार धारण कराया जाता है और छप्पन भोग अर्पित किए जाते हैं। वृंदावन के राधावल्लभ, राधारमण और अन्य मंदिरों में तथा देशभर के इस्कॉन केंद्रों में भी कीर्तन, कथा और उत्सव होते हैं।
बहुत से भक्त इस दिन आधे दिन का उपवास रखते हैं और मध्याह्न आरती के बाद प्रसाद ग्रहण करते हैं। घरों में श्रीराधा-कृष्ण के युगल स्वरूप की पूजा की जाती है। यह दिन स्मरण कराता है कि भगवान तक पहुँचने का सबसे सरल मार्ग शुद्ध और समर्पित प्रेम है।
- Tithi
- भाद्रपद शुक्ल अष्टमी
- Month
- August–September
- Places
- Barsana, Vrindavan, Mathura