जगन्नाथ रथ यात्रा
पुरी में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की विशाल रथों पर निकलने वाली यात्रा, जब स्वयं भगवान भक्तों को दर्शन देने मंदिर से बाहर आते हैं।
ओडिशा के पुरी धाम में भगवान श्रीकृष्ण "जगन्नाथ", अर्थात संपूर्ण जगत के स्वामी, के रूप में अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं। लोकप्रिय परंपरा के अनुसार राजा इंद्रद्युम्न की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने इस रूप में प्रकट होना स्वीकार किया। रथ यात्रा वह अवसर है जब भगवान स्वयं गर्भगृह से बाहर आकर सड़क पर सभी भक्तों को, जाति या वर्ग का भेद किए बिना, दर्शन देते हैं। भक्त इसे भगवान का अपनी मौसी के घर, गुंडिचा मंदिर, जाना मानते हैं।
रथ यात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को निकलती है, जो अंग्रेज़ी कैलेंडर में प्रायः जून या जुलाई में आती है। इससे पहले ज्येष्ठ पूर्णिमा को स्नान यात्रा होती है, जिसके बाद भगवान लगभग दो सप्ताह "अनसर" में एकांतवास करते हैं।
इस यात्रा के लिए हर वर्ष नए लकड़ी के रथ बनाए जाते हैं। भगवान जगन्नाथ का रथ नंदीघोष, बलभद्र जी का रथ तालध्वज और सुभद्रा जी का रथ दर्पदलन कहलाता है। यात्रा आरंभ होने से पहले पुरी के गजपति राजा सोने की मूठ वाली झाड़ू से रथों के आगे का मार्ग बुहारते हैं। यह "छेरा पहँरा" की रस्म दिखाती है कि भगवान के सामने राजा भी एक सेवक है। फिर लाखों भक्त मोटे रस्सों से रथ खींचते हुए उन्हें गुंडिचा मंदिर तक ले जाते हैं। लगभग एक सप्ताह वहाँ विराजने के बाद भगवान "बाहुड़ा यात्रा" में मुख्य मंदिर लौटते हैं।
गुजरात के अहमदाबाद में जमालपुर के जगन्नाथ मंदिर से निकलने वाली रथ यात्रा भारत की सबसे बड़ी रथ यात्राओं में से एक है, जिसमें सजे हुए हाथी, भजन मंडलियाँ और अखाड़े शामिल होते हैं। इस्कॉन के माध्यम से आज विश्व के अनेक नगरों में भी रथ यात्रा निकाली जाती है।
- Tithi
- आषाढ़ शुक्ल द्वितीया
- Month
- June–July
- Places
- Puri, Ahmedabad