ब्रज की होली
बरसाना की लट्ठमार होली से लेकर वृंदावन की फूलों की होली और दाऊजी के हुरंगे तक, ब्रजभूमि में रंगों का वह उत्सव जो श्रीराधा-कृष्ण के प्रेम में रँगा है।
होली का पर्व भक्त प्रह्लाद की कथा से जुड़ा है। हिरण्यकशिपु अपने पुत्र प्रह्लाद की विष्णु-भक्ति से क्रोधित था। उसकी बहन होलिका, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान माना जाता था, प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई, परंतु भगवान की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका जल गई। इसी की स्मृति में फाल्गुन पूर्णिमा की रात होलिका दहन होता है और अगले दिन रंगों की होली खेली जाती है।
ब्रजभूमि में होली का रंग सबसे गहरा है, क्योंकि यहाँ यह श्रीराधा और श्रीकृष्ण की प्रेममयी लीलाओं से जुड़ी है। लोकप्रिय परंपरा के अनुसार साँवले कृष्ण ने माता यशोदा से पूछा कि राधा इतनी गोरी क्यों हैं, तो मैया ने हँसकर कहा कि जाकर उन्हें अपने रंग में रँग दो। तभी से ब्रज में होली प्रेम और आनंद का उत्सव बन गई। यह पर्व फाल्गुन मास में, अंग्रेज़ी कैलेंडर के अनुसार प्रायः फरवरी-मार्च में, मनाया जाता है और ब्रज में इसका उल्लास कई दिनों तक चलता है।
बरसाना की प्रसिद्ध लट्ठमार होली में नंदगाँव के ग्वाले बरसाना आते हैं और वहाँ की महिलाएँ हँसी-ठिठोली के साथ उन पर लाठियाँ बरसाती हैं, जिन्हें वे ढालों से रोकते हैं। अगले दिन बरसाना के ग्वाले नंदगाँव जाते हैं और वहाँ यही उत्सव होता है। इससे पहले बरसाना के श्रीजी मंदिर में लड्डू होली भी खेली जाती है। वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में रंगभरी एकादशी (फाल्गुन शुक्ल एकादशी) के आसपास फूलों की होली होती है, जब भक्तों पर रंग के स्थान पर फूलों की पंखुड़ियाँ बरसाई जाती हैं। धुलेंडी के अगले दिन बलदेव (दाऊजी) में "हुरंगा" होता है, जिसमें महिलाएँ पुरुषों के कपड़े फाड़कर उन्हीं से कोड़े बनाकर खेलती हैं।
गुजरात में भी फाल्गुन का यह उत्सव "फागोत्सव" के रूप में मनाया जाता है। द्वारका और डाकोर में फाल्गुन पूर्णिमा पर बड़ा मेला लगता है और अनेक श्रद्धालु पैदल चलकर डाकोर के रणछोड़राय जी के दर्शन करने पहुँचते हैं, जहाँ भगवान के साथ अबीर-गुलाल और फूलों से होली खेली जाती है।
- Tithi
- फाल्गुन मास; होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा को, रंगों की होली अगले दिन
- Month
- February–March
- Places
- Barsana, Nandgaon, Vrindavan, Mathura, Baldeo, Dwarka, Dakor