श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 8, श्लोक 18
अध्याय 8 – अक्षरब्रह्मयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
avyaktād vyaktayaḥ sarvāḥ prabhavantyaharāgame .
rātryāgame pralīyante tatraivāvyaktasaṃjñake ॥
अर्थ
ब्रह्मा के दिन के आगमन पर अव्यक्त से सम्पूर्ण व्यक्त (प्रकट) जगत् उत्पन्न होता है और रात्रि के आगमन पर उसी ‘अव्यक्त’ नामक तत्त्व में लीन हो जाता है
शब्दार्थ
- अव्यक्तात् – अव्यक्त से (कारण-अवस्था से)
- व्यक्तयः सर्वाः – सब व्यक्त पदार्थ
- प्रभवन्ति – उत्पन्न होते हैं
- अहरागमे – दिन के आगमन पर
- रात्र्यागमे – रात्रि के आगमन पर
- प्रलीयन्ते – लीन हो जाते हैं
- तत्र एव – उसी में
- अव्यक्तसंज्ञके – ‘अव्यक्त’ नाम वाले में
अन्वय
अहरागमे अव्यक्तात् सर्वाः व्यक्तयः प्रभवन्ति; रात्र्यागमे तत्र एव अव्यक्तसंज्ञके प्रलीयन्ते ।
व्याख्या
यहाँ सृष्टि का चक्र बताया गया है। ब्रह्मा के दिन का आरम्भ होने पर ‘अव्यक्त’ से समस्त प्राणी और पदार्थ — जिन्हें यहाँ ‘व्यक्तयः’ कहा गया — प्रकट होते हैं; और रात्रि आने पर वे उसी अव्यक्त में लौट जाते हैं। अव्यक्त का अर्थ है जो इन्द्रियों से प्रकट नहीं, अर्थात् सृष्टि की बीज-अवस्था।
इसकी तुलना जागने और सोने से की जा सकती है। रात में हम सोते हैं तो संसार का अनुभव हमारे लिए लीन हो जाता है, और प्रातः जागने पर वही रूप-जगत् फिर प्रकट होता है। उसी प्रकार प्रलय-काल में समस्त जगत् अपने सूक्ष्म कारण में विश्राम करता है और नया दिन आने पर फिर उदित होता है।
आचार्य शंकर यहाँ ‘अव्यक्त’ को भगवान् की माया-शक्ति या अव्यक्त प्रकृति मानते हैं, जो कार्य रूप में जगत् को सुलाए और जगाए रखती है। रामानुज के अनुसार अव्यक्त वह प्रकृति है जो भगवान् के शरीर रूप में रहती है। जो भी व्याख्या हो, यह स्पष्ट है कि सृष्टि कोई एक बार की घटना नहीं बल्कि निरन्तर चलने वाला चक्र है।
इससे यह शिक्षा मिलती है कि प्रकट रूपों से चिपकना अस्थायी बात से चिपकना है। जो आज प्रकट है, वह कल लीन है; इसलिए जो कारण-तत्त्व इन सब रूपों के भीतर और पीछे है, उसी की ओर ध्यान जाना चाहिए।
प्रसंग
8.17 में ब्रह्मा के दिन-रात का काल-पैमाना था। यहाँ उस दिन-रात में सृष्टि और लय की क्रिया बताई गई है, और अगले श्लोक में उसी भूतसमुदाय का बार-बार उत्पन्न होना कहा जाएगा।
जीवन-शिक्षा
जो आज बहुत ठोस लगता है, वह भी बीज-रूप से लौटने वाला है। इस बोध से पदार्थों के प्रति आसक्ति कम होती है और मन उस स्थिर आधार को खोजता है जो इन परिवर्तनों में अपरिवर्तित रहता है।
मुख्य शब्द
- अव्यक्त
- सृष्टि की सूक्ष्म, अप्रकट कारण-अवस्था (प्रकृति)
- व्यक्ति
- प्रकट हुए रूप — सारा चराचर जगत्
- प्रलय
- सृष्टि का अव्यक्त में लीन हो जाना
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 8.13 – ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्
- गीता 8.14 – अनन्यचेताः सततं यो
- गीता 8.15 – मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्
- गीता 8.16 – आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन
- गीता 8.17 – सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद् ब्रह्मणो विदुः
- गीता 8.19 – भूतग्रामः स एवायं
- गीता 8.20 – परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः
- गीता 8.21 – अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां
- गीता 8.22 – पुरुषः स परः
- गीता 8.23 – यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं